उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में जैसे ही गर्मी ने दस्तक दी, वैसे ही एक खास परंपरा भी शुरू हो गई। शुक्रवार सुबह भस्म आरती के बाद मंदिर परिसर में एक अलग ही आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिला, जब भगवान महाकाल पर सतत शीतल जलधारा अर्पित करने की शुरुआत हुई। यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि श्रद्धा और परंपरा का अनोखा संगम है, जिसे देखने के लिए देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
भीषण गर्मी में जहां इंसान खुद को ठंडक देने के उपाय करता है, वहीं भगवान महाकाल को भी शीतलता प्रदान करने की यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। यह अनुष्ठान न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि भगवान के प्रति भक्तों के प्रेम और सेवा भाव को भी उजागर करता है।
महाकाल मंदिर में शीतल जलधारा की परंपरा का महत्व
महाकाल मंदिर में शीतल जलधारा अर्पण की यह परंपरा हर साल वैशाख कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होकर ज्येष्ठ पूर्णिमा तक चलती है। इस दौरान भगवान महाकाल पर सुबह 6 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक लगातार जलधारा अर्पित की जाती है।
यह जलधारा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि भगवान को गर्मी से राहत देने का एक प्रतीकात्मक तरीका है। श्रद्धालुओं के लिए यह दृश्य बेहद खास होता है, क्योंकि वे पूरे दिन भगवान पर बहती जलधारा के दर्शन कर सकते हैं। इस परंपरा के पीछे यह भावना जुड़ी है कि जिस तरह हम अपने प्रियजनों का ध्यान रखते हैं, उसी तरह भगवान की सेवा भी पूरे समर्पण के साथ की जानी चाहिए।
11 कलशों से पवित्र नदियों का आव्हान
इस विशेष अनुष्ठान में 11 मिट्टी के कलशों का उपयोग किया जाता है, जो इस परंपरा को और भी खास बनाते हैं। इन कलशों में गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, सरयू और क्षिप्रा जैसी पवित्र नदियों का स्मरण किया जाता है।
मंत्रोच्चार के साथ इन नदियों का आव्हान कर जल स्थापित किया जाता है, जो लगातार भगवान महाकाल पर प्रवाहित होता रहता है। यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की विविध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धारा को भी दर्शाती है।
‘गलंतिका’ परंपरा और विशेष अभिषेक
महाकाल मंदिर में शीतल जलधारा अर्पित करने के लिए एक विशेष विधि अपनाई जाती है, जिसे ‘गलंतिका’ कहा जाता है। इसमें रजत अभिषेक पात्र के साथ गलंतिका बांधकर जलधारा चढ़ाई जाती है।
यह प्रक्रिया बहुत ही सावधानी और श्रद्धा के साथ की जाती है। पुजारी आशीष के अनुसार, इस बार अधिक मास होने के कारण इस परंपरा की अवधि एक महीने तक बढ़ा दी गई है।






