मकर संक्रांति के पावन पर्व पर उज्जैन में आस्था का सैलाब देखने को मिला। दो दिन के पर्वकाल के कारण श्रद्धालुओं में खास उत्साह नजर आया। ठंड के बावजूद तड़के चार बजे से ही शिप्रा नदी के घाटों पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। घाटों पर मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही उज्जैन की गलियों और घाटों पर धार्मिक ऊर्जा साफ दिखाई दी। शिप्रा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने दान-पुण्य किया और तिल-गुड़ का वितरण कर जरूरतमंदों की सेवा की। यह पर्व केवल स्नान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक बनकर सामने आया।
दो दिन के पर्वकाल से बढ़ी श्रद्धालुओं की संख्या
पंचांग के अनुसार इस वर्ष मकर संक्रांति पर दो दिन का पर्वकाल रहा। इसी कारण उज्जैन में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में अधिक दर्ज की गई। दूर-दराज से आए भक्तों ने दोनों ही दिन शिप्रा स्नान को पुण्यकारी मानते हुए आस्था की डुबकी लगाई। हजारों श्रद्धालु शिप्रा नदी पहुंचे, जिनमें परिवार के साथ आए बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल रहे।
शिप्रा स्नान में दिखी आस्था और परंपरा की झलक
मकर संक्रांति पर उज्जैन में शिप्रा स्नान मुख्य आकर्षण रहा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन शिप्रा में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। तड़के से ही रामघाट, नृसिंह घाट, दत्त अखाड़ा घाट और गऊघाट पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने सूर्य को अर्घ्य दिया और दान-पुण्य किया। घाटों पर मौजूद साधु-संतों ने भी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूबा रहा।
मकर संक्रांति पर होंगे विशेष धार्मिक आयोजन
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर उज्जैन में धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला जारी रहेगी। शिप्रा के त्रिवेणी संगम स्थित प्राचीन श्री नवग्रह शनि मंदिर से सूर्यदेव की भव्य पालकी यात्रा निकाली जाएगी। इस अवसर पर आध्यात्मिक संत कृष्णा गुरुजी मकर संक्रांति को पिता-पुत्र दिवस के रूप में मनाएंगे। दोपहर 2 बजकर 45 मिनट पर सूर्यदेव की सवारी नगर भ्रमण के लिए रवाना होगी।
पालकी यात्रा के दौरान शंख, घंटे, घड़ियाल और ढोल-ढमकों की मंगल ध्वनि से पूरा क्षेत्र गूंज उठेगा। सूर्यदेव की पालकी के साथ नवग्रहों की ध्वजाएं रहेंगी और 111 वेदपाठी बटुक धर्म ध्वजा लेकर यात्रा में शामिल होंगे। दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर सूर्यदेव को पुनः शनि मंदिर में विराजित किया जाएगा, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न होगी।
तिल-गुड़ का भोग और विशेष हवन अनुष्ठान
धार्मिक परंपरा के अनुसार सूर्यदेव को तिल और गुड़ का भोग लगाया जाएगा। मंदिर परिसर में कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर से लाई गई अर्क मिट्टी में शमी और मदार के पौधे भी लगाए जाएंगे। इसके बाद विशेष हवन अनुष्ठान किया जाएगा। हवन में शनि मंत्रों के साथ तिल और सूर्य मंत्रों के साथ गुड़ की आहुति दी जाएगी। साथ ही दोनों ग्रहों से जुड़ी वनस्पतियों और औषधियों की आहुतियां भी डाली जाएंगी। इस आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखा जा रहा है।





