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डोपामिन, सेरोटोनिन और रंगों की मस्ती: होली क्यों देती है हैप्पीनेस बूस्ट, जानिए क्या कहती है कलर साइकोलॉजी

Written by:Shruty Kushwaha
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होली सिर्फ रंगों और मस्ती का त्योहार नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरा मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक असर भी छिपा है। जब लोग होली पर एक-दूसरे से मिलते हैं, रंग लगाते हैं, नाचते गाते हैं और साथ में जश्न मनाते हैं तो हमारे मस्तिष्क में डोपामिन और सेरोटोनिन जैसे ‘फील-गुड’ केमिकल्स सक्रिय हो जाते हैं। यही केमिकल्स हमारे मूड को बेहतर बनाते हैं और तनाव कम करते हैं। कलर साइकोलॉजी के अनुसार अलग-अलग रंग हमारी भावनाओं को भी प्रभावित करते हैं।
डोपामिन, सेरोटोनिन और रंगों की मस्ती: होली क्यों देती है हैप्पीनेस बूस्ट, जानिए क्या कहती है कलर साइकोलॉजी

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होली आते ही गलियों में रंग उड़ने लगते हैं, ढोल की थाप गूंजती है और लोग “बुरा न मानो होली है” कहते हुए एक-दूसरे को गले लगा लेते हैं। पहली नजर में यह सिर्फ रंगों और मस्ती का त्योहार लगता है लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार रंगों का मनोविज्ञान बहुत गहरा है। यही वजह है कि होली के दौरान रंग, संगीत, हंसी-मजाक और सामूहिक उत्सव हमारे मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डालते हैं, जिससे खुशी और अपनापन दोनों इमोशन बढ़ जाते हैं।

दरअसल, जब लोग एक साथ उत्सव मनाते हैं, नाचते-गाते हैं और सामाजिक रूप से जुड़ते हैं, तब मस्तिष्क में डोपामिन और सेरोटोनिन जैसे ‘फील-गुड’ न्यूरोट्रांसमीटर सक्रिय हो जाते हैं। ये रसायन हमारे मूड को बेहतर बनाते हैं और तनाव कम करने में मदद करते हैं।अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार सामाजिक मेल-मिलाप और सामुदायिक गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती हैं और अकेलेपन की भावना को कम करती हैं।

होली के रंग क्यों देते हैं खुशी 

होली की सुबह अन्य सुबहों से बहुत अलग होती है। हम घर से बाहर निकलते हैं और इस बात के लिए तैयार होते हैं कि हमारे परिचित या फिर कोई अपरिचित भी हमें रंग लगा सकता है। कमाल की बात ये कि इस त्यौहार पर अपरिचय का रंग फीका पड़ जाता है और सब अपनत्व के रंग में रंग जाते हैं। लेकिन यह सिर्फ त्योहार का उल्लास भर नहीं बल्कि हमारे दिमाग का जादुई रीसेट है और इसके पीछे पूरा विज्ञान छिपा है। आइए होली के हर प्रमुख रंग को अलग-अलग समझते हैं जो सिर्फ चेहरे पर नहीं लगते, बल्कि दिमाग और मूड पर भी गहरा असर डालते हैं

रंगों का जादू: कलर साइकोलॉजी 

लाल रंग: होली का सबसे चटकदार और एनर्जी वाला लाल रंग। ये ऊर्जा, उत्साह, पैशन और एक्साइटमेंट का प्रतीक है। यह हृदय गति और एड्रेनालिन बढ़ाता है, जिससे आपको तुरंत “फाइट या फन” मोड मिलता है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि लाल रंग उत्तेजना बढ़ाता है। कभी पॉजिटिव (प्यार, जोश) तो कभी नेगेटिव (गुस्सा)..लेकिन होली में ये ज्यादातर खुशी और एनर्जी के रूप में काम करता है।

गुलाबी रंग: गुलाल का अर्थ ही गुलाबी रंग से जोड़कर देखा जाता है। ये प्यार, सॉफ्टनेस और स्वीटनेस का रंग है। गुलाबी रंग जेंटल, अफेक्शनेट और लविंग फीलिंग्स बढ़ाता है। यह तनाव कम करता है और लगाव बढ़ाता है। होली में गुलाबी रंग लगाने से वो “सबको प्यार” वाली वाइब आती है।  खासकर बच्चों और लड़कियों में ये बहुत पॉपुलर है। कई अध्ययनों में पिंक को प्रेम और कोमलता से जुड़ा पाया गया है।

पीला रंग: सूरज जैसा चमकदार, खुशी का सबसे बड़ा बूस्टर पीला रंग। ये ऑप्टिमिज्म, आशावाद, जॉय और पॉजिटिविटी से जुड़ा है। पीला सेरोटोनिन (खुशी का हार्मोन) को बढ़ावा देता है और डिप्रेशन जैसी फीलिंग्स को दूर भगाता है। होली में पीला रंग फेंकते ही मूड लाइट हो जाता है  जैसे कोई ब्रेन को “सब ठीक हो जाएगा” कह रहा हो। अध्ययनों में पीला ब्राइटनेस और पॉजिटिव इमोशंस से जुड़ा पाया गया है।

नारंगी रंग: पीले और लाल का मिक्स यानी एनर्जी + खुशी का परफेक्ट कॉम्बो। नारंगी रंग क्रिएटिविटी, एंथुजियाज्म, वार्म्थ और सोशल वाइब्स बढ़ाता है। यह उत्साह और ऑप्टिमिज्म देता है, बिना ज्यादा इंटेंस हुए। होली में नारंगी गुलाल लगाने से वो “लाइफ इज फन” वाला फील आता है..जैसे ब्रेन कह रहा हो “आज तो बस मस्ती ही करना है”।

नीला रंग: ठंडक और सुकून का रंग नीला। ये रंग शांति, ट्रस्ट, स्टेबिलिटी और सुकून लाता है। साथ ही स्ट्रेस और एंग्जायटी कम करता है। लेकिन ज्यादा नीला कभी-कभी “फीलिंग ब्लू” यानी की उदासी को भी ट्रिगर कर सकता है। होली में नीला रंग कम इस्तेमाल होता है, लेकिन जब भी ये इस्तेमाल हो है तो “शांत लेकिन खुश” वाला बैलेंस देता है। जैसे पार्टी के बीच थोड़ा सा आराम मिला हो।

हरा रंग: प्रकृति का रंग, बैलेंस और रिलैक्सेशन का राजा हरा रंग। ये शांति, हार्मनी, ग्रोथ और रिफ्रेशमेंट देता है। स्ट्रेस कम करता है, क्रिएटिविटी बढ़ाता है और माइंड को शांत रखता है। होली में हरा रंग लगाने से वो “सब कुछ बैलेंस्ड है” वाला सुकून मिलता है। खासकर जब चटक रंगों के बीच हरा आता है तो ब्रेन को ब्रेक मिलता है। अध्ययन कहते हैं कि हरा पॉजिटिव इमोशंस जैसे कम्फर्ट, रिलैक्सेशन, हैप्पीनेस से जुड़ा है।

(डिस्क्लेमर : ये लेख विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त जानकारियों पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।)

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Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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