उज्जैन के होटल और रेस्टोरेंट में अब सुबह का नाश्ता पहले जैसा नहीं रहा है। दरअसल महाकाल के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को अब गर्मागर्म जलेबी और फाफड़ा आसानी से नहीं मिल पा रहा है। शहर में गैस सिलेंडर की भारी किल्लत के कारण अधिकतर दुकानदारों ने इन लोकप्रिय व्यंजनों को बनाना बंद कर दिया है। इसका सीधा असर उज्जैन की पहचान बन चुके सुबह के पोहा-जलेबी नाश्ते पर पड़ा है, जो अब ईरान-अमेरिका युद्ध से पैदा हुए गैस संकट की मार झेल रहा है।

दरअसल मालवा क्षेत्र में सुबह की शुरुआत अक्सर पोहा-जलेबी से होती है, लेकिन अब यह आदत बदलती दिख रही है। उज्जैन के करीब 5 हजार होटल और रेस्टोरेंट में रोज सुबह चाय, पोहा, जलेबी, फाफड़ा और पापड़ी का नाश्ता तैयार होता था। गैस की कमी ने इस पूरी व्यवस्था को बिगाड़ दिया है। कई रेस्टोरेंट संचालकों ने जलेबी, फाफड़ा और पापड़ी बनाना पूरी तरह बंद कर दिया है, जबकि कुछ दुकानों पर इसे दिन में सिर्फ एक बार ही बनाया जा रहा है। पूरे दिन गरमागरम नाश्ता मिलना अब मुश्किल हो गया है।

शहर की प्रमुख नाश्ते की दुकानों पर भी जलेबी मिलना बंद हो गया है। जनता टी स्टॉल, महाकाल रेस्टोरेंट, जैन समोसा-कचोरी रेस्टोरेंट, काका के समोसे, नागर पोहा-जलेबी रेस्टोरेंट जैसे मशहूर ठिकानों पर अब जलेबी नहीं बन रही है। इसके अलावा फ्रीगंज, ऋषिनगर, नानाखेड़ा, कंठाल, सराफा, इंदौर गेट, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के सामने स्थित कई होटल और रेस्टोरेंट भी इस किल्लत से जूझ रहे हैं।

गैस संकट से काका के समोसे भी महंगे

‘काका के समोसे’ रेस्टोरेंट के संचालक ने बताया है कि युद्ध के बाद से गैस की कमी लगातार बनी हुई है। सिलेंडर मिलना अब मुश्किल हो गया है। मजबूरी में उन्होंने लकड़ी की भट्टी पर समोसे बनाना शुरू कर दिया है, वह भी दिन में केवल एक बार। पहले पूरे दिन समोसे बनाए जाते थे। चाय बनाने के लिए अब सिर्फ इंडक्शन का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने बताया है, “करीब 15 दिनों से जलेबी नहीं बनाई गई है, क्योंकि जलेबी बनाने के लिए लंबे समय तक गैस की जरूरत होती है।”

उनके के अनुसार गैस नहीं मिलने से उन्हें हर महीने करीब 80 हजार से 1 लाख रुपए तक का आर्थिक नुकसान हो रहा है। महंगाई बढ़ने से बिक्री भी कम हो गई है। इसी कारण समोसा-कचोरी का दाम 12 रुपए से बढ़ाकर 15 रुपए कर दिया गया है। चाय भी 8 रुपए की जगह अब 10 रुपए में बिक रही है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।

जनता टी स्टॉल के संचालक ने भी अपनी परेशानी बताई है। उनके यहां दिनभर जलेबी, फाफड़ा और पापड़ी की अच्छी बिक्री होती थी। पहले जलेबी लगातार बनती रहती थी, लेकिन अब केवल सुबह एक बार ही बनाई जा रही है। जलेबी की चाशनी और चाय का काम इंडक्शन पर किया जा रहा है, क्योंकि गैस की कमी से काफी परेशानी हो रही है।

जनता टी स्टॉल के संचालक ने बताया है कि पहले समोसे 15 रुपए में बेचे जाते थे, लेकिन गैस की आपूर्ति कम होने और तेल-दाल की कीमत बढ़ने के कारण अब समोसे 18 रुपए में बेचे जा रहे हैं। उन्होंने गैस पाइपलाइन लगवाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बताया गया कि दो महीने की वेटिंग चल रही है। इससे रेस्टोरेंट चलाने में और दिक्कतें आ रही हैं।

उज्जैन में सबसे सस्ते समोसा-कचोरी बेचने वाले फ्रीगंज स्थित जैन समोसा रेस्टोरेंट में भी दाम बढ़ गए हैं। संचालक ने बताया है कि वे पिछले 15 साल से समोसा-कचोरी 8 रुपए में बेच रहे थे। लेकिन गैस की किल्लत के कारण 10 दिन पहले दाम बढ़ाकर 10-10 रुपए कर दिए गए हैं। इससे पता चलता है कि समस्या कितनी बड़ी है, जब इतने सालों से चले आ रहे दाम भी बदलने पड़े हैं।

मजबूरी में कई आइटम बंद करने पड़ रहे हैं

व्यापारियों का कहना है कि मजबूरी में उन्हें नाश्ते के कई आइटम बंद करने पड़ रहे हैं या फिर दाम बढ़ाकर समोसा-कचोरी का आकार छोटा करना पड़ रहा है। इससे नुकसान भी हो रहा है, क्योंकि पहले जो ग्राहक दो समोसे या दो कचोरी खाता था, अब एक ही ले रहा है। जो ग्राहक पहले पोहा और जलेबी भी खाता था, अब सिर्फ समोसा या पोहा ही ले रहा है। वहीं 10 रुपए में मिलने वाली चाय की मात्रा भी कम कर दी गई है, जबकि फुल चाय अब 15 से 20 रुपए तक बेची जा रही है।

उज्जैन में गैस संकट सिर्फ कारोबारियों के लिए ही नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी बड़ी समस्या बन गया है। सुबह का पारंपरिक नाश्ता अब या तो महंगा हो गया है या मिलना ही बंद हो गया है। महाकाल के शहर में आने वाले श्रद्धालु भी इस बदलाव से हैरान हैं, जब उन्हें सुबह गरमागरम नाश्ता नहीं मिल पा रहा है। ईरान-अमेरिका युद्ध की आंच उज्जैन की रसोई तक पहुंच गई है, जिससे नाश्ते का स्वाद और लोगों की जेब दोनों पर असर पड़ रहा है।