कलेक्टर से बोले छात्र,”सर, अधीक्षक की पत्नी मारपीट करती हैं, 50 सीट वाले छात्रावास में 100 विद्यार्थी रखे, कैसे करें पढ़ाई?”

आदिम जाति कल्याण विभाग के छात्रावास गरीब छात्रों को रहने की सुविधा देकर उनकी बेहतर शिक्षा के लिए सरकार ने बनाये हैं लेकिन यहाँ पदस्थ अधीक्षक की मनमानी और विभागीय अफसरों की लापरवाही सरकार की मंशा पर पलीता लगा रहे हैं ।
Tribal Boys Hostel Umaria

पढ़ने की उम्र में और स्कूल टाइम में बच्चों का कलेक्टर के ऑफिस जाना कहां तक ठीक है? बच्चों से खचाखच भरे कलेक्ट्रेट परिसर की यह तस्वीरें बहुत कुछ कह रही हैं, एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं कि आखिर इन बच्चों को अपनी पढ़ाई छोड़कर क्यों कलेक्टर के दरवाजे आना पड़ा? निश्चित है इनकी फरियाद प्रारंभिक स्तर पर नहीं सुनी गई होगी तभी ये एक भरोसा लेकर जिले के सबसे बड़े अधिकारी के पास गुहार लगाने पहुंचे हैं।

मामला आदिम जाति कल्याण विभाग के आदिवासी बालक छात्रावास करकेली का है, जहां के आधा सैकड़ा बच्चे छात्रावास अधीक्षक की  शिकायत लेकर कलेक्टर के पास पहुंचे, उन्होंने बताया कि अधीक्षक ने 50 सीटर कमरों में 100 बच्चों को रखा हुआ है, सोने के लिए भी  बिस्तर नहीं हैं, एक बैड में दो और तीन बच्चों को जगह दी जाती है, जिसके कारण हमें परेशानी होती है।

अधीक्षक की पत्नी मारपीट करती हैं 

छात्रों ने कहा कि दूसरा छात्रावास बना हुआ है उसमें भी 50 सीटें हैं लेकिन अधीक्षक उसमें ताला डालकर रखते हैं, खाने भी अच्छा नहीं मिलता, कई बार शिकायत कर दी लेकिन कोई नहीं सुनता, गंभीर आरोप लगाते हुए छात्रों ने कहा कि शिकायत करने पर अधीक्षक की पत्नी बच्चों के साथ मारपीट करती हैं।

कलेक्टर ने दिया जाँच का भरोसा

छात्रों ने कहा कि सरकार ने हमारे लिए छात्रावास इसलिए बनाये हैं जिससे हम गरीब छात्र यहाँ रहकर पढ़ाई कर सकें लेकिन यहाँ की अव्यवस्थाओं से पढ़ाई प्रभावित हो रही है इसलिए हमें कलेक्टर सर के पास न्याय की उम्मीद लेकर आये हैं, डिप्टी कलेक्टर हरनीत कौर कलसी ने कहा छात्रों की शिकायत सुन ली गई है कलेक्टर सर ने इसके लिए जाँच दल बनाकर जाँच के आदेश दिए हैं जाँच के आधार पर एक्शन लिया जायेगा

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उमरिया से ब्रजेश श्रीवास्तव की रिपोर्ट 

Atul Saxena
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पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव.

पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena →
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