प्रयागराजः उत्तर प्रदेश में बुलडोजर एक्शन को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बार फिर बेहद सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य में दंडात्मक तोड़फोड़ की कार्रवाई जारी है। अदालत ने हमीरपुर से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह नाराजगी व्यक्त की, जहां याचिकाकर्ताओं ने अपनी संपत्तियों को बुलडोजर से बचाने के लिए गुहार लगाई थी।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने कहा कि सजा के तौर पर इमारतों को गिराना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि सजा देने का अधिकार सिर्फ न्यायपालिका के पास है। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि यह चलन लगातार बना हुआ है।
क्या है हमीरपुर का मामला?
यह मामला हमीरपुर जिले का है, जहां फैमुद्दीन और उनके माता-पिता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने अपनी संपत्तियों, जिसमें एक घर, एक लॉज और एक आरा मिल शामिल है, को प्रशासन द्वारा संभावित रूप से तोड़े जाने से बचाने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जनवरी में उनके एक रिश्तेदार के खिलाफ रेप, POCSO एक्ट और यूपी गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत FIR दर्ज की गई थी। उनका आरोप है कि इस घटना के तुरंत बाद पुलिस की मिलीभगत से एक भीड़ ने उनके घर पर हमला किया। इसके कुछ ही समय बाद, जिला अधिकारियों ने उन्हें संपत्तियां गिराने का नोटिस जारी कर दिया, जबकि वे FIR में आरोपी भी नहीं थे।
कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की डबल बेंच ने इस पैटर्न पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहां किसी अपराध के बाद उस जगह रहने वाले लोगों को तुरंत नोटिस थमा दिया जाता है और फिर कानूनी प्रक्रिया का दिखावा कर इमारत को ध्वस्त कर दिया जाता है।
“अदालत ऐसे कई मामलों की गवाह है, जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने की जगह पर कब्ज़ा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी किया जाता है। इसके बाद कानूनी ज़रूरतों को पूरा करने का दिखावा करके उसे तोड़ दिया जाता है।”
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही यह सिद्धांत स्थापित कर चुकी है कि किसी को सजा देने के लिए इमारतों को ध्वस्त करना गलत है। इसके बावजूद यूपी में ऐसी कार्रवाइयां रुक नहीं रही हैं। कोर्ट की यह टिप्पणी राज्य में चल रहे बुलडोजर एक्शन की कानूनी वैधता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है।





