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दतिया और बांकीपुर चुनाव में भाजपा की हार पर अखिलेश यादव का तंज, बोले- भगवान ने अपनी धुन पर नचाया है

तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, जहां भाजपा को अपनी पारंपरिक सीटों पर भी हार का मुंह देखना पड़ा। अखिलेश यादव ने इसे 'घमंड' की हार बताया।
दतिया और बांकीपुर चुनाव में भाजपा की हार पर अखिलेश यादव का तंज, बोले- भगवान ने अपनी धुन पर नचाया है

राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों की है। जिन सीटों पर भाजपा को अपनी जीत सुनिश्चित मानकर चला जा रहा था, वहां की स्थिति अब आश्चर्यजनक रूप से उलटफेर भरी बन गई है। बांकीपुर और दतिया, ये वो नाम हैं जहां कमल को मुरझाते देख राजनीतिक पंडित भी अपने आकलन पर फिर से विचार करने को मजबूर हैं। भाजपा की पारंपरिक और अभेद्य मानी जाने वाली बांकीपुर सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रकाश किशोर की शानदार जीत ने जहां एक नई इबारत लिख दी, वहीं दतिया में उम्मीदों के विपरीत कांग्रेस ने भगवा खेमे को तगड़ा झटका दिया। इन अप्रत्याशित परिणामों के बाद विपक्ष ने भाजपा पर तीखा हमला बोलना शुरू कर दिया है, जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो इन नतीजों पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सीधा प्रहार किया है। उनकी भाषा शैली इतनी तीखी है कि भाजपा के रणनीतिकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दे। अखिलेश ने कहा, “भगवान ने उन लोगों को, जो घमंड से सोचते थे कि वे उन्हें नचा सकते हैं, अपनी धुन पर नचाया है।” यह एक ऐसा तंज है जो सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के अहंकार पर चोट करता है। उन्होंने आगे कहा कि “जो लोग खुद को भगवान से ऊपर समझते थे, उन्हें भगवान ने ही चलती ट्रेन से बेदर्दी से फेंक दिया, और उनके घमंड के बुखार के साथ।” अखिलेश यादव की इस टिप्पणी में युवाओं की एकता और उनके अभिभावकों के गुस्से का मिला-जुला परिणाम साफ झलकता है, जिसे उन्होंने कई गंभीर आरोपों के साथ गिनाया है।

भाजपा ने लोगों के भरोसे और विश्वास को दिया धोखा: अखिलेश

अखिलेश ने भाजपा पर ‘वोट चोरी’, ‘पेपर चोरी’, ‘डोनेशन-ऑफर-कंट्रीब्यूशन चोरी’, ‘नौकरी चोरी’, और ‘रिज़र्वेशन चोरी’ जैसे गंभीर आरोप मढ़े हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने ‘कमीशन करप्शन’, ‘PDA पर ज़ुल्म’, ‘बड़े पैमाने पर करप्शन’, ‘महंगाई का डंक’, ‘मिलावट को सरकारी मंज़ूरी’, ‘माँ-बेटियों का अपमान’ और ‘देश के Gen Z पर हर तरह से हमला’ जैसे मुद्दे भी उठाए। उनका स्पष्ट मानना है कि भाजपा ने इन सभी तरीकों से लोगों के भरोसे और विश्वास को धोखा दिया है, और यही कारण है कि जनता ने उन्हें सबक सिखाया है। यह एक ऐसी लंबी फेहरिस्त है जो सीधे तौर पर भाजपा के शासन मॉडल पर प्रश्नचिह्न लगाती है और विपक्ष को एक नया हथियार थमा देती है।

अब तो BJP वाले भी अपने ‘किसी’ का इस्तीफ़ा मांगेंगे: अखिलेश यादव

इन नतीजों के बाद भाजपा के अंदरूनी खेमे में भी खलबली मची हुई है। अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह दिया कि “अब तो BJP वाले भी अपने ‘किसी’ का इस्तीफ़ा मांगेंगे।” यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर भाजपा में हार की जिम्मेदारी तय करने या इस्तीफे की परंपरा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। उनका यह कहना कि “जो अपनी ही विधानसभा सीटें हार गए, उनके भरोसे नैया कैसे पार होगी” सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधता है। अखिलेश का यह तंज कि “यह हार उन्हीं की है जिन्होंने उन्हें चुना या यूं कहें कि अपनी मर्ज़ी से संगठन पर थोपा” भाजपा के भीतर की गुटबाजी और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। अब कोई यह नहीं कह सकता कि ‘BJP में इस्तीफ़े नहीं होते’, क्योंकि इन नतीजों के बाद अंदरूनी दबाव बढ़ना तय है।

विपक्ष ने भाजपा की चुनावी रणनीति और नेतृत्व क्षमता पर साधा निशाना

सबसे ज्यादा खुश तो उत्तर प्रदेश में ‘वो’ लोग हैं, जिन्हें ‘PDA’ समुदाय का होने की वजह से जानबूझकर नेशनल लेवल का पद न देकर स्टेट लेवल का पद दिया गया। इन नतीजों के बाद उनकी मुस्कुराहट कुछ ज्यादा ही गहरी हो गई है। वे अब खुले तौर पर पूछ रहे हैं: ‘5 बड़े या 7?’ यह एक ऐसा सवाल है जो यूपी की राजनीति में अंदरूनी समीकरणों और शक्ति संतुलन को लेकर चल रही चर्चाओं को हवा दे रहा है। जनता भी अब यह कहने लगी है कि अगर नेशनल प्रेसिडेंट एक विधानसभा सीट नहीं जिता सका, तो स्टेट प्रेसिडेंट भी एक भी चुनाव नहीं लड़वा पाएगा। यह टिप्पणी भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व क्षमता पर सीधे तौर पर सवाल उठाती है।

इन उपचुनावों के नतीजों को ‘डबल इंजन सरकार की डबल हार’ के रूप में देखा जा रहा है। ये नतीजे सिर्फ हार नहीं, बल्कि बदलाव की शुरुआत का संकेत हैं। भाजपा की सबसे सुरक्षित और पारंपरिक सीटें भी अब उन्हें हार से नहीं बचा पाएंगी, यह स्पष्ट हो गया है। भाजपा का संकट सिर्फ हार से कहीं ज़्यादा होगा, यह ‘ड्रोन और दूरबीन’ से भी टिकट चाहने वाले को न ढूंढ पाने के बारे में होगा, यानी योग्य उम्मीदवारों की कमी और आंतरिक कलह का संकेत। हालांकि, इन चुनावों में जीतने वाले सभी उम्मीदवारों को उनकी जीत पर बधाई देना भी जरूरी है। उम्मीद है कि वे नई उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए सतर्क, अलर्ट और संविधान के प्रति पूरी तरह कमिटेड रहेंगे। और हां, एक बात और, राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट है कि भाजपा के अंदर भी ‘लड्डू बांटे जा रहे हैं’, शायद कुछ लोग इन नतीजों से अपने प्रतिद्वंद्वियों के कमजोर होने से खुश हैं।

Gaurav Sharma
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पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma
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