
UP Anti-Conversion Law: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के प्रावधानों पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह कानून धर्म परिवर्तन के इच्छुक व्यक्ति के लिए एक कठिन प्रक्रिया प्रस्तुत करता है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि किसी के धार्मिक विश्वास को बदलना व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन इस कानून के प्रावधान उस स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन से पहले और बाद में जानकारी सार्वजनिक करने की शर्त गोपनीयता के अधिकार पर गंभीर सवाल उठाती है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान इस स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
कठोर प्रक्रिया और सरकारी हस्तक्षेप पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम में धर्म बदलने वाले व्यक्ति को कई स्तरों की औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है। इसमें जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस की भागीदारी अनिवार्य की गई है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि धर्म परिवर्तन से पहले और बाद में घोषणाएं देना तथा उनकी जांच कराना एक “कठिन और डराने वाली प्रक्रिया” है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे प्रावधान व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पर सवाल खड़े करते हैं, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित अधिकार के विपरीत हैं।
गोपनीयता के अधिकार और संवैधानिक वैधता पर सवाल
शीर्ष अदालत ने कहा कि धर्मांतरण की जानकारी सार्वजनिक करने की बाध्यता व्यक्ति की निजता के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पसंद को सार्वजनिक करने की कानूनी आवश्यकता संविधान में निहित गोपनीयता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकती है। जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने कहा कि ऐसे प्रावधानों की “गहन संवैधानिक जांच” की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आस्था के अधिकार से टकराव में न हों। अदालत ने इस पहलू को भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से भी जोड़ा।
संविधान की प्रस्तावना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर जोर
न्यायालय ने कहा कि भारत की धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, जिसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं किया जा सकता। पीठ ने 1973 के *केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य* के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धर्मनिरपेक्षता, आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान की आत्मा हैं। अदालत ने कहा कि प्रस्तावना में दर्ज “विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता” हर नागरिक का अधिकार है और राज्य का यह कर्तव्य है कि वह इस आजादी की रक्षा करे। कोर्ट ने कहा कि भारत का धर्मनिरपेक्ष ढांचा हर धर्म को समान सम्मान देने पर आधारित है।
कोर्ट ने रद्द कीं पांच FIR
धर्मांतरण से जुड़े कई मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पांच प्राथमिकी रद्द कर दीं। इनमें से एक मामला फतेहपुर के हरिहरगंज स्थित इवेंजेलिकल चर्च ऑफ इंडिया में कथित सामूहिक धर्मांतरण से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि यूपी पुलिस द्वारा दर्ज कई एफआईआर में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। वहीं एक अन्य मामले में कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया और कहा कि आगे जांच केवल आईपीसी के अन्य प्रावधानों के तहत ही जारी रह सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और बदलने की पूरी स्वतंत्रता है।
