लखनऊ: उत्तर प्रदेश में जमीन और संपत्ति की खरीद-बिक्री में होने वाले फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने के लिए योगी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में संपत्ति की रजिस्ट्री से जुड़े नियमों को और सख्त कर दिया गया है। अब किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री तभी होगी, जब विक्रेता का नाम सरकारी भूमि रिकॉर्ड यानी खतौनी में दर्ज नाम से मेल खाएगा।

लोकभवन में आयोजित इस अहम बैठक में कुल 31 प्रस्ताव रखे गए, जिनमें से 30 को हरी झंडी दे दी गई। इन फैसलों का सीधा असर प्रदेश के आम नागरिकों पर पड़ेगा, खासकर उन लोगों पर जो संपत्ति खरीदने या बेचने की प्रक्रिया में हैं। सरकार का दावा है कि इस नई व्यवस्था से भू-माफियाओं और धोखेबाजों पर शिकंजा कसा जा सकेगा।

रजिस्ट्री से पहले खतौनी की जांच, रुकेगा फर्जीवाड़ा

अब तक संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए आधार कार्ड या वोटर आईडी जैसे पहचान पत्रों को ही आधार माना जाता था। इसका फायदा उठाकर कई धोखेबाज किसी और की संपत्ति को अपना बताकर बेच देते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा।

नई प्रक्रिया के तहत, जैसे ही कोई संपत्ति बेचने के लिए रजिस्ट्री ऑफिस में आवेदन करेगा, स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग सबसे पहले राजस्व विभाग के रिकॉर्ड से खतौनी की जांच करेगा। विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि जो व्यक्ति संपत्ति बेच रहा है, वही उसका असली मालिक है या नहीं। अगर विक्रेता का नाम खतौनी में दर्ज नाम से अलग पाया जाता है, तो रजिस्ट्री की प्रक्रिया तुरंत रोक दी जाएगी और मामले की जांच की जाएगी। मिल्कियत यानी मालिकाना हक की पुष्टि के बिना अब कोई भी रजिस्ट्री नहीं की जा सकेगी।

ग्रामीण परिवहन को मिलेगी नई रफ्तार

कैबिनेट ने शहरी सुविधाओं के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। ‘मुख्यमंत्री ग्रामीण परिवहन योजना’ के तहत प्रदेश के सभी 59,163 गांवों को बस सेवा से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक राज्य के 12 हजार से ज्यादा गांवों में बस की कोई सुविधा नहीं थी, जिससे ग्रामीणों को काफी परेशानी होती थी।

इस योजना के तहत छोटी बसों का संचालन किया जाएगा ताकि वे गांवों की संकरी सड़कों पर आसानी से चल सकें। सरकार ने इस सेवा को प्रोत्साहित करने के लिए इसे टैक्स-फ्री रखने का फैसला किया है। साथ ही, इस योजना में निजी बस ऑपरेटरों को भी जोड़ा जाएगा ताकि कनेक्टिविटी का जाल तेजी से बिछाया जा सके।

स्टाम्प और विकास शुल्क के नियमों में भी बदलाव

बैठक में सर्किल रेट पर लगने वाले एक फीसदी शुल्क और विकास शुल्क के रूप में लगने वाले 2 फीसदी अतिरिक्त स्टांप शुल्क से जुड़े प्रावधानों को भी बदला गया है। पहले यह राशि उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) जारी होने के बाद स्थानीय निकायों को दी जाती थी, जिसमें काफी देर होती थी। अब यह राशि हर छह महीने पर यानी छमाही आधार पर निकायों को जारी कर दी जाएगी, जिससे विकास कार्यों में तेजी आएगी। स्टाम्प शुल्क की गणना सर्किल रेट के आधार पर ही होगी और नगर निगम सीमा के भीतर 2 फीसदी विकास शुल्क अलग से देना होगा।