सरकारी स्कूल के आदिवासी बच्चे मदरसे में पढ़ने को मजबूर, एनजीओ संचालक ने लगाए आरोप, कलेक्टर ने सिरे से नकारा

सरकारी स्कूल के आदिवासी बच्चे मदरसे में पढ़ने को मजबूर, एनजीओ संचालक ने लगाए आरोप, कलेक्टर ने सिरे से नकारा

विदिशा, डेस्क रिपोर्ट। एक ओर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दिन रात प्रयास कर रहे हैं कि उनके भांजे भांजी अच्छी पढ़ाई कर अपनी जिंदगी सवार सकें, वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग और शिक्षा अधिकारी उनके इस सपने की खिल्ली उड़ाते हुए नजर आ रहे हैं।

आपको बता दें कि मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में तब हड़कंप मच गया जब एक एनजीओ संचालक ने खुलासा कर जानकारी दी कि विदिशा जिले के तोपपुरा प्राइमरी स्कूल के बच्चे टीचर के भेदभाव के चलते मदरसे में पढ़ने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं एनजीओ संचालक ने इस बात की शिकायत राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग में भी दर्ज कराई है।

जब बच्चों से टीचर के व्यवहार को लेकर सवाल किया गया तब बच्चों ने स्वीकारा कि उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता है। इतना ही नहीं मदरसा संचालक ने भी इस बात को कबूला है कि सरकारी स्कूल के बच्चे उनके यहां बिना नाम दर्ज किए पढ़ने आते हैं।

हालांकि जिला कलेक्टर ने इस बात को सिरे से खारिज किया है और बताया है कि आयोग के नोटिस के बाद हमने एक कमेटी गठित कर मामले की जांच की और पाया कि जिन बच्चों की बात एनजीओ संचालक द्वारा की जा रही है उनमें से कुछ बच्चे शासकीय प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते हैं और कुछ अशासकीय विद्यालय में अपनी पढ़ाई कर रहे हैं, इनमें से कोई भी बच्चा मदरसे में पढ़ने नहीं जाता है। इतना ही नहीं शासकीय प्राथमिक स्कूल तोपरा को सरकार द्वारा नियमित फंडिंग भी दी जा रही है। जहां तक बात है स्कूल में शिक्षकों द्वारा ठीक से ना पढ़ाई जाने की तो इसको लेकर हम निश्चित तौर पर जांच कर रहे हैं। बाकी और जो भी शिकायत है हमारे सामने हैं हम उनकी भी जांच करा रहे हैं।जब आयोग द्वारा शिक्षा विभाग को इस बात के लिए नोटिस जारी किया गया और विभाग ने शिक्षक से जवाब मांगा, तब शिक्षक ने इस आरोप को सिरे से नकार दिया।

एनजीओ संचालक ने बताया कि कोरोना के बाद जब इन बच्चों को स्कूल में दाखिल होने नहीं दिया गया तब मजबूरन यह बच्चे पास ही के मदरसे में जाकर पढ़ाई करने लगे। वहीं शिक्षक का कहना है कि ऐसा कुछ भी नहीं है 2 महीने से बारिश के चलते यह बच्चे स्कूल नहीं आ रहे थे, बारिश खत्म होने के बाद हमने इन बच्चों से कहा कि अब तुम लोग रोज स्कूल आओ, जिस पर बच्चों का कहना रहता है कि हम काम करते हैं और पैसे कमाते हैं, अगर हम काम नहीं करेंगे तो खाएंगे कैसे।

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निदेशक और संपादक

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