22 दिनों में 25 बीएलओ की मौत! कमलनाथ ने केंद्र और राज्य सरकारों पर लगाए गंभीर लापरवाही के आरोप, कहा “प्रशासनिक चूक और सरकारी संवेदनहीनता का खुला प्रमाण”

उन्होंने कहा कि जमीनी कार्य की सारी जिम्मेदारी सिर्फ बीएलओ पर डाल दी गई है लेकिन न तो उन्हें किसी तरह की सुरक्षा प्रदान की गई है, न संसाधन और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं। ऐसे में काम के बोझ तले दबे बीएलओ लगातार मानसिक तनाव से गुज़र रहे हैं। पूर्व सीएम ने कहा कि सरकार की तरफ ने न तो मेडिकल सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, न कोई विशेष पैकेज दिया जा रहा है और अतिरिक्त स्टाफ की व्यवस्था भी नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि जब सत्ता सिर्फ टाइमलाइन देखती है और लोगों की जान को महत्व नहीं देती तो ऐसे ही भयावह नतीजे सामने आते हैं।
Madhya Pradesh Farmers

Kamal Nath

वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलनाथ ने मतदाता सूची संशोधन के दौरान देशभर में हुई बीएलओ कर्मचारियों की मौत को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखा हमला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से उन्होंने कहा कि सिर्फ 22 दिनों के भीतर सात राज्यों में 25 बीएलओ की जान जा चुकी है, जिनमें सबसे ज्यादा नौ मौतें मध्यप्रदेश में हुई हैं।

कमलनाथ ने इसे सामान्य घटना मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह सरकार की गंभीर लापरवाही और प्रशासनिक संवेदनहीनता का खुला प्रमाण है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने सारा बोझ निचले स्तर के कर्मचारियों पर डाल दिया है लेकिन उन्हें न सुरक्षा दी गई, न संसाधन और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं। उन्होंने कहा कि ऐसे माहौल में मौतें होना दुखद तो है ही, लेकिन इससे ज्यादा दुखद यह है कि सरकार इसे सिर्फ काम का प्रेशर बताकर आगे बढ़ जाना चाहती है।

कमलनाथ ने बीएलओ की मौत को लेकर सरकार को घेरा

पूर्व मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार 79 फीसदी काम पूरा होने का दावा कर रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि इस 79 फीसदी के पीछे कितने कर्मचारियों की जान गई। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर जैसे बड़े शहरों में काम धीमा इसलिए है क्योंकि जमीनी कर्मचारी लगातार बीमार पड़ रहे हैं और टूट रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या कोई मंत्री या मुख्यमंत्री इन मृतक कर्मचारियों के परिवारों से मिलेगा? क्या उन्हें उचित मुआवजा और राहत दी जाएगी या सरकारें बस चुनावी प्रतिशत की रिपोर्ट देती रहेंगी और मौतों को आंकड़ों में दबाती रहेंगी?

कहा ‘प्रशासन और शासन के असंवेदनशील रवैये का खामियाजा भुगत रहे हैं बीएलओ’

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा है कि विशेषज्ञों के अनुसार बीएलओ पर दोहरे दबाव की वजह से वे लगातार तनाव और स्वास्थ्य जोखिम में हैं। लेकिन सरकार की तरफ से न कोई मेडिकल सहायता, न विशेष पैकेज और न अतिरिक्त स्टाफ की व्यवस्था की गई है। जब सत्ता केवल टाइमलाइन देखती है और लोगों की जान को महत्व नहीं देती, तब ऐसे भयावह नतीजे सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के अलावा गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी 4–4 मौतें हो चुकी हैं, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड में भी बीएलओ की जान गई है। यह साफ संकेत है कि समस्या सिर्फ एक राज्य की नहीं यह प्रशासनिक असफलता का राष्ट्रीय पैटर्न बन चुकी है। कमलनाथ ने कहा कि बीएलओ लोकतंत्र की रीढ़ होते हैं। उनकी मौतें सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सरकार की संवेदनहीनता का प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि जब तक सरकार फील्ड कर्मचारियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और संसाधनों की उचित व्यवस्था नहीं करेगी, तब तक हर मौत की सीधी जिम्मेदारी सरकार पर ही रहेगी।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
Shruty Kushwaha

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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