Corona एक अनुभव ऐसा भी

Corona एक अनुभव ऐसा भी

भोपाल।
लॉक डाउन के बीच लोग इंसानियत की एक से एक मिसाल पेश कर रहे है, हर कोई किसी का हमदर्द बना हुआ है, कोई किसी के घर खाना-राशन पहुंचा कर मदद कर रहा है है तो कोई दवाइयां।ऐसा ही एक अनुभव भोपाल में देखने को मिला जब भोपाल शहर के जाने-माने रेडियोलॉजिस्ट शैलेष लुणावत ने ममता गैस एजेंसी के मालिक स्मित मेहता को फोन किया और मदद मांगी।

स्मित मेहता ने बताया कि आज दिन के 11 बजे अचानक मेरे मोबाइल पर कहीं से फोन आता है – स्मित भाई कमर्शियल सिलिंडर की ज़रूरत है। 1500 ज़रूरत मंद लोगों के लिए फूड पैकेट्स बनाना है। काम बंद हो जाएगा। तमाम डिलीवरी वाहन निकल चुके हैं। क्या करू? मैंने बिना एक पल सोचे, आव देखा न ताव अपनी कार उठाई, अपने गोडाउन पहुंचा और एकमात्र मौजूद स्टाफ गोडाउन कीपर से दो कमर्शियल फिल्ड गाड़ी में रखवाए और निकल पड़ा ।थोड़ी देर में बताए पते पर पहुंचने पर डॉक्टर शैलेष लुणावत ने दो मीटर दूर से नमस्कार करते हुए मेरा स्वागत किया। मुझे देख कर प्रसन्नता, राहत, कृतार्थ होने जाने के भाव उनकी आंखो में स्पष्ट देखे जा सकते थे। चेहरे पर मास्क लगा होने से आंखे ही तो पड़ी जा सकती थी। भाव भी ऐसे, जैसे मैंने उनका व्यक्तिगत कोई बहुत बड़ा कार्य कर दिया हो। उन्होंने धन्यवाद की बौछार लगा दी।

मैंने शर्मिंदा होकर कहा- डाक साहब ये तो मेरा फ़र्ज़ था। इसके बाद उन्होंने मुझे किचन का मुआयना करवाया। करीब 1500 लोगों का खाना डॉक्टर साहब स्वयं बनवाते हैं। खाना देने भी खुद जाते हैं। सख्ती के साथ एक मीटर की दूरी का पालन करवाते हैं।डॉक्टर लुणावत, भोपाल शहर के जाने-माने रेडियोलॉजिस्ट हैं। अपना खुद का सेंटर है, जिसमें सिटी स्कैन से लेकर अल्ट्रासाउंड एक्सरे सब कुछ है। लेकिन मानवता की पुकार पर, अपनी प्रतिष्ठा को कहीं दूर त्याग कर समर्पित भाव से दिन रात लगे हुए है। हालांकि ऐसा में और दो सेंटर में कर चुका हूं। परन्तु यहां कुछ अलग सा था। उन्होंने बताया, यह कार्य वो प्रथम दिन से अंतिम दिन तक सतत करते रहेंगे।

स्मित बताते है कि आप लोग सोच रहे होंगे कि ये सब मै आप लोगों से क्यों शेयर कर रहा हूं? एक बात कहूं जब मैं जा रहा था तो सोच रहा था कि मैं एक गैस एजेंसी का मालिक बहुत बड़ा काम कर रहा हूं। लेकिन मानवता के प्रति डॉक्टर शैलेष लुणावत का समर्पण देखा तो मुझे अपने विचारों बहुत छोटे लगे। मेरा अभिमान चूर चूर हो गया।दरअसल देवताओं को हम मंदिर मस्जिद में खोजने जाते हैं, मगर वो तो हमारे आस पास ही कहीं है।

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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