कलेक्टर ने वल्लभ भवन की श्मशान घाट से की तुलना

कलेक्टर ने वल्लभ भवन की श्मशान घाट से की तुलना

भोपाल।
विवादों को लेकर चर्चाओं में रहे गुना के कलेक्टर भास्कर लक्षकार का एक और विवादित बयान सामने आया है। दरअसल गुना के एसपी राहुल लोड़ा का तबादला पुलिस मुख्यालय हो गया है और उनका विदाई समारोह रविवार को आयोजित किया गया ।इस विदाई समारोह में बोलते हुए कलेक्टर भास्कर लक्षकार ने कहा कि ट्रांसफर एक रूटीन प्रक्रिया है ।

भोपाल की स्थिति ऐसी है जैसे आदमी मरकर श्मशान आता है वैसे ही अधिकारी ट्रांसफर होकर वल्लभ भवन पहुंचते हैं। आईपीएस अधिकारी के लिए यही स्थिति पीएचयू यानी पुलिस मुख्यालय की है ।सब की गति वही है। कलेक्टर ने वल्लभ भवन की तुलना भला श्मशान घाट से क्यों की या पीएचक्यू को भी उसी के समतुल्य क्यों बताया, यह तो वही जाने लेकिन उनके इस बयान ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

आमतौर पर कलेक्टर एसपी की पोस्टिंग मलाईदार मानी जाती है और वल्लभ भवन को लूप लाइन माना जाता है ।क्या कलेक्टर यही कहना चाहते हैं तो फिर सेवाओं में ईमानदारी या कर्तव्य परायणता जैसी चीज बची ही कहा क्योंकि वल्लभ भवन में बैठने वाले अधिकारी भी काम तो करते ही हैं और शासन उन्हें भी जिम्मेदारी तो देता ही है

Gaurav Sharma
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पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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