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MP में कुपोषण के मुद्दे पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा, उमंग सिंघार का आरोप “300 की जगह सिर्फ 170 दिन मिला पोषण आहार”

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि "बीजेपी सरकार मध्यप्रदेश में पोषण घटा कर कुपोषण को बढ़ावा दे रही है।" उन्होंने सरकार से सवाल किया कि इस कटौती के लिए कौन ज़िम्मेदार है।
Umang Singhar

मध्यप्रदेश में कुपोषण के मुद्दे को लेकर कांग्रेस एक बार फिर प्रदेश सरकार पर हमलावर है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने पोषण आहार की उपलब्धता को लेकर प्रदेश सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मिशन पोषण 2.0 के तहत जिस अवधि में पोषण आहार उपलब्ध कराया जाना था उसके मुकाबले प्रदेश में काफी कम दिनों तक आहार का वितरण हुआ है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि केंद्र सरकार के मिशन पोषण 2.0 के तहत गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए पूरक पोषण की व्यवस्था की गई है। सरकारी दिशानिर्देशों में पूरक पोषण की नियमित उपलब्धता और निर्धारित पोषण मानकों का पालन अनिवार्य है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

उमंग सिंघार ने पोषण के मुद्दे पर सरकार को घेरा

उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश में साल में 300 दिन पोषण आहार उपलब्ध कराया जाना था, लेकिन लगभग 170 दिन ही आहार मिल पाया। इसका अर्थ ये हुआ कि पोषण आहार में लगभग 130 दिनों की कमी रही। इसी को लेकर उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार इस बात का जवाब दे कि बच्चों के हिस्से का पोषण कहां गया।

बीजेपी से किए सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने बालाघाट के आदिवासी इलाकों में बच्चों की मौतों का हवाला देते हुए सरकार की पोषण व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि “बालाघाट के आदिवासी अंचल में 20 बच्चों की कुपोषण से मौत और अब दतिया में 16 महीने की बच्ची की मौत, ये सरकार की नाकाम पोषण नीतियों का भयावह परिणाम है। एक तरफ सरकार कुपोषण मिटाने के बड़े-बड़े विज्ञापन छपवा रही है, दूसरी तरफ बच्चों की थाली से पोषण गायब है।” उन्होंने पूछा कि मोहन सरकार बताए, बच्चों के पोषण में कटौती का जिम्मेदार कौन है?

जारी है चुनौतियां

मध्यप्रदेश में बच्चों और महिलाओं के पोषण स्तर में पिछले वर्षों में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। पोषण ट्रैकर के आंकड़ों में भी पोषण संकेतकों में सुधार दर्ज किया गया है। राज्य की करीब 97,805 आंगनवाड़ियों के माध्यम से लगभग 64 लाख लाभार्थियों को पोषण सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। हालांकि, एनएफएचएस-6 के उपलब्ध आंकड़ों में स्टंटिंग घटकर 31.4 प्रतिशत होने के बावजूद वेस्टिंग और अंडरवेट बच्चों की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पोषण संबंधी चुनौतियां अधिक गंभीर हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों को पर्याप्त और विविध आहार उपलब्ध कराना, आंगनवाड़ी सेवाओं की नियमितता सुनिश्चित करना और एनीमिया की रोकथाम पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। सरकार पोषण अभियान, सक्षम आंगनवाड़ी और एनीमिया मुक्त भारत जैसी योजनाओं के जरिए कुपोषण से निपटने का प्रयास कर रही है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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