
Sangita Sharma
मध्यप्रदेश कांग्रेस की जानी-मानी नेत्री और प्रवक्ता संगीता शर्मा ने राज्य सरकार पर सवाल उठाए है, उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति में किसानों के नाम पर सबसे अधिक बातें होती हैं। सत्ता पक्ष भाजपा किसानों को “देश की रीढ़” और “अन्नदाता” कहकर सम्मान देने की भाषा बोलता है। लेकिन जमीनी सच्चाई इसके उलट है।
संगीता शर्मा ने उठाए सवाल
सोचिए, सरकार शराब की एक-एक बोतल पर एमआरपी लिखवाना अनिवार्य करती है ताकि ग्राहक और व्यापारी को कीमत पर धोखा न मिले। परंतु जब बात खेत की उपज की आती है, तो वही सरकार एमएसपी को कानूनी गारंटी देने से पीछे हट जाती है। सवाल उठता है, क्या शराब की बोतल की कीमत किसान की मेहनत की कमाई से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
किसान परेशान
मध्यप्रदेश ही नहीं, पूरे देश में किसान कई दशकों से फसल का सही दाम पाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन उनकी आवाज सुनने की बजाय सत्ता ने अक्सर लाठियों से जवाब दिया है। किसानों को खाद-बीज के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है,कर्ज चुकाने के लिए साहूकारों और बैंकों की चौखट पर सिर झुकाना पड़ता है और जब वे हक माँगने के लिए सड़कों पर उतरते हैं तो उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार होता है। आखिर यह कैसा न्याय है कि जो किसान पूरे देश का पेट भरता है, वही भूख, कर्ज़ और आत्महत्या के बोझ से टूटकर मरता है?
आत्महत्या की त्रासदी सबसे कड़वी हकीकत
आज भाजपा शासन में किसानों की आत्महत्या एक आम बात हो चुकी है। सूखा, ओलावृष्टि, बेमौसम बारिश और मंडियों में सही दाम न मिल पाने की वजह से किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। आँकड़े बताते हैं कि हर साल हजारों किसान अपना जीवन गंवा रहे हैं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर मौत के पीछे टूटा हुआ परिवार, उजड़ा हुआ घर और अधूरा सपना छिपा है। भाजपा के भाषणों में किसान “देश की आत्मा” हैं, लेकिन व्यवहार में वे सिर्फ राजनीतिक नारों का हिस्सा भर बनकर रह गए हैं। मध्यप्रदेश, जहाँ आप और मैं रहते हैं, वहां किसान आत्महत्या की यह त्रासदी और भी नजदीकी और चिंताजनक है। हर 12 घंटे में एक किसान की मृत्यु होती है। यह कोई उपहास नहीं, बल्कि एनसीआरबी के आंकड़ों में दर्ज एक भयानक सच है।
भाजपा बनाम कमलनाथ : नीयत का फर्क :
विडंबना यह है कि जिन भाजपा नेताओं ने बार-बार उद्योगपतियों पर प्रहार करके किसानों के नाम पर राजनीति की, उन्हीं के शासन में किसान सबसे ज्यादा त्रस्त हुए। इसके विपरीत, कांग्रेस के नेता कमलनाथ ने कभी “किसान पुत्र” होने का दावा नहीं किया, लेकिन मुख्यमंत्री रहते उन्होंने किसानों के दर्द को समझा। कमलनाथ सरकार ने किसानों का कर्ज माफ किया और कई योजनाएँ शुरू कीं, जिनसे सीधे किसानों को राहत मिली। यहां असली फर्क नीयत का है। भाजपा ने किसानों को केवल चुनावी मंचों पर याद किया, जबकि कमलनाथ ने किसानों को उनकी पीड़ा से उबारने का वास्तविक प्रयास किया। यही कारण है कि नेताओं ने कमलनाथ की सरकार को गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी, ताकि किसान फिर से बाजार और माफियाओं की मार झेलने को मजबूर हों।
सरकार का किसान विरोधी नीतियों का दोहरापन
मध्यप्रदेश के मौजूदा “किसान पुत्र” मुख्यमंत्री किसानों को सिर्फ वादों का झुनझुना पकड़ा रहे हैं। सच्चाई यह है कि किसान आज भी फसल का दाम पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। सरकार ने एमएसपी पर कानूनी गारंटी नहीं दी। किसानों का भविष्य असुरक्षित है और वर्तमान अपमान से भरा हुआ। खाद के लिए किसानों को लाठी मिल रही है। सरकार शराब की बोतल पर तो दाम तय कर सकती है, लेकिन अन्नदाता की मेहनत का मूल्य तय करने से पीछे हट जाती है। यह दोहरे चरित्र का सबसे बड़ा उदाहरण है।
किसान के मन में यही सवाल
आज हर किसान के मन में यही सवाल है कि जब शराब की बोतल पर सरकार कीमत की गारंटी दे सकती है, तो फसल पर क्यों नहीं? जब उद्योगपतियों को करोड़ों की राहत पैकेज मिल सकते हैं, तो किसानों को न्याय क्यों नहीं, जब सरकारें अपने नेताओं और अफसरों की सुरक्षा पर अरबों खर्च करती हैं, तो किसानों के जीवन की सुरक्षा क्यों नहीं, किसान राजनीति का केवल चेहरा नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवनरेखा है। बिना किसान के देश का अस्तित्व ही असंभव है। सरकार यदि अन्नदाता को उसका हक नहीं देतीं, तो वे अपने वादों और कर्तव्यों से विश्वासघात कर रही हैं। आज जरूरत है कि किसानों की मेहनत का सम्मान किया जाए, उनकी उपज पर एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए और उन्हें मजबूरी, कर्ज और आत्महत्या से बाहर निकाला जाए। अन्नदाता पूछ रहा है कि जब शराब की बोतल की कीमत पर सरकार गारंटी दे सकती है, तो मेरी फसल पर क्यों नहीं, यही सवाल आज पूरे देश के किसानों की आवाज बन चुका है।
