पीएम मोदी बोले “पीएम मित्र पार्क से आगे बढ़ेगी देवी अहिल्याबाई की विरासत”, जानिए माहेश्वरी साड़ी का इतिहास और विशेषताएं

माहेश्वरी साड़ी सिर्फ एक परिधान नहीं बल्कि महेश्वर की सांस्कृतिक धरोहर है। यह मालवा की शाही परंपरा, नर्मदा घाटी की आस्था और स्थानीय शिल्पकारों की सृजनशीलता का प्रतीक है। अब माहेश्वरी साड़ी की यात्रा अहिल्याबाई होल्कर के दरबार से होकर आधुनिक रैम्प तक पहुंच चुकी है। इससे साबित होता है कि जब परंपरा और आधुनिकता का मेल होता है तो उसकी चमक दुनियाभर में बिखरती है।
PM Modi

Maheshwari Saree

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन पहले अपने जन्मदिन पर धार जिले के भैंसोला में ‘पीएम मित्र पार्क’ का शिलान्यास किया। इसके बाद सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पीएम मित्र पार्क के माध्यम से माहेश्वरी साड़ी को बढ़ावा देकर हम देवी अहिल्याबाई की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देवी अहिल्याबाई होल्कर ने माहेश्वरी साड़ी को नया आयाम दिया था और हम उसी परंपरा को और आगे लेकर जाएंगे।

माहेश्वरी साड़ी आज सिर्फ देश ही नहीं विदेशों तक अपनी पहचान बना चुकी है। मध्यप्रदेश के महेश्वर शहर से निकली माहेश्वरी साड़ी कभी होलकर राजवंश की रानी अहिल्याबाई की कल्पना का नतीजा थी। आज वो भारतीय हथकरघा की दुनिया में एक चमकता हुआ नाम है। आइए जानते हैं माहेश्वरी साड़ी का इतिहास और विशेषताएं।

माहेश्वरी साड़ी का इतिहास: देवी अहिल्याबाई से शुरु हुई परंपरा

माहेश्वरी साड़ी की कहानी शुरु होती है 18वीं शताब्दी से जब मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया। उस समय उन्होंने स्थानीय बुनकरों को प्रोत्साहित कर एक विशेष साड़ी की शुरुआत करवाई, जिसे शाही दरबारों में पहनने का गौरव मिला। इसमें नर्मदा नदी के किनारे बसे इस शहर की प्राचीन बुनाई परंपरा है जो 5000 साल पुरानी बताई जाती है। यही साड़ी आगे चलकर माहेश्वरी साड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई। 20वीं शताब्दी में इसके बाज़ार में गिरावट के बाद कई अलग अलग संगठनों ने 1970 के दशक में इसे पुनर्जीवित किया।

बुनाई और डिज़ाइन 

माहेश्वरी साड़ी की बुनाई हथकरघे पर की जाती है। इसमें कॉटन और सिल्क का बारीक संगम होता है जो इसे हल्का, मुलायम और आरामदायक बनाता है। इसके बॉर्डर और पल्लू पर बने जियोमेट्रिक डिज़ाइन, चंद्रकला, बेलदार, हंसगुड़ी विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। साड़ी की बॉडी पर स्ट्राइप्स, चेक और छोटे-छोटे मोटिफ जैसे बूटी के छोटे डिज़ाइन बनाए जाते हैं। ये डिज़ाइन नर्मदा नदी की लहरों, स्थानीय वास्तुकला और फूलों से प्रेरित होते हैं जो प्रकृति और संस्कृति का मिश्रण दर्शाते हैं। माहेश्वरी साड़ी को जीआई टैग मिला भी है, जो इस बात प्रमाण है कि यह साड़ी महेश्वर से आती है और इसकी बुनाई व कारीगरी वहां की खास परंपरा को दर्शाती है।

बॉर्डर ऐसी कि दोनों ओर से पहनी जा सके साड़ी

इसकी सबसे अनूठी पहचान है रिवर्सिबल बॉर्डर जिसे दोनों ओर से पहना जा सकता है। पहले के समय में इसके बॉर्डर में पर सोने या चांदी की जरी का उपयोग होता था। अब भी कई साड़ियों में ये इस्तेमाल होती है। इसकी बुनाई की तकनीक ऐसी होती है कि दोनों तरफ का डिज़ाइन समान रूप से आकर्षक और उपयोगी रहे।

सांस्कृतिक धरोहर है ये साड़ी

माहेश्वरी साड़ी सिर्फ एक परिधान नहीं बल्कि महेश्वर और निमाड़-मालवा अंचल की सांस्कृतिक धरोहर है। यह मालवा की शाही परंपरा, नर्मदा घाटी की आस्था और स्थानीय शिल्पकारों की सृजनशीलता को जोड़ती है। स्थानीय लोगों में त्योहारों और शादियों में इसका पहनना आज भी गौरव और शान का प्रतीक माना जाता है।

आधुनिक युग में नई पहचान

समय के साथ माहेश्वरी साड़ी ने खुद को बदलते फैशन के अनुरूप बखूबी ढाला है। अब यह पेस्टल रंगों, आधुनिक पैटर्न और फ्यूजन डिज़ाइनों में भी उपलब्ध है। अब इसे इको-फ्रेंडली डाई और शुद्ध कॉटन या वुमन वेरिएंट में भी बनाया जा रहा है। देश-विदेश के कई डिजाइनर इसे ग्लोबल फैशन रैम्प पर उतार चुके हैं। ई-कॉमर्स और एक्सपोर्ट ने इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। आज माहेश्वरी साड़ी सिर्फ शादी-ब्याह का परिधान नहीं रही, बल्कि ऑफिस, कैज़ुअल विवर और फेस्टिव पहनावे में भी अपनी अलग पहचान बना चुकी है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
Shruty Kushwaha

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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