भोपाल। टनल के भीतर हर मिनट करीब 25 हजार लीटर पानी का रिसाव हो रहा था। ऊपर से नेशनल हाईवे और रेलवे लाइन गुजर रही थी, जबकि नीचे मार्बल, लाइमस्टोन और डोलोमाइट जैसी मजबूत चट्टानें खुदाई को और कठिन बना रही थीं। हालात इतने चुनौतीपूर्ण थे कि खुदाई में लगी अमेरिकी मशीन भी बीच में जवाब दे गई। कई बार ऐसा लगा कि यह परियोजना अधूरी ही रह जाएगी, लेकिन करीब 18 वर्षों की मेहनत के बाद अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्लीमनाबाद टनल’ पूरा होने के बेहद करीब पहुंच गया है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री ने कटनी पहुंचकर निर्माण कार्य की प्रगति का निरीक्षण किया।
करीब 11.95 किलोमीटर लंबी और 10.14 मीटर व्यास वाली यह सुरंग प्रदेश की सबसे जटिल इंजीनियरिंग परियोजनाओं में मानी जा रही है। इसके शुरू होने के बाद नर्मदा नदी का पानी प्राकृतिक ढाल (ग्रेविटी फ्लो) के जरिए बिना किसी पंप या बिजली के सोन नदी बेसिन तक पहुंचेगा। इससे कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना के करीब 1450 गांवों की 2.45 लाख हेक्टेयर खेती को सिंचाई का स्थायी लाभ मिलेगा।
इंजीनियरों के सामने हर कदम पर आई नई चुनौती
स्लीमनाबाद टनल का निर्माण आसान नहीं था। विंध्य पर्वतमाला की करीब 40 मीटर ऊंची रिज लाइन के नीचे सुरंग बनाना सबसे मुश्किल काम था। खुदाई के दौरान विशाल भूमिगत गुफाएं मिलीं, चट्टानों की कठोर परतें सामने आईं और कई जगहों से तेज जल रिसाव शुरू हो गया। कुछ हिस्सों में हर मिनट करीब 25 हजार लीटर पानी टनल के भीतर आने लगा, जिससे काम कई बार रोकना पड़ा। लगातार आ रही तकनीकी दिक्कतों के कारण अमेरिकी मशीन भी खराब हो गई। इसके बाद जर्मनी से आधुनिक हेरेनकनेक्ट मशीन मंगाकर विशेष ग्राउटिंग तकनीक के जरिए रिसाव को नियंत्रित किया गया और निर्माण कार्य फिर रफ्तार पकड़ सका।

हाईवे और रेलवे लाइन के नीचे से बनाई गई सुरंग
इस परियोजना की एक और बड़ी चुनौती थी कि सुरंग को आबादी वाले क्षेत्र, नेशनल हाईवे और रेलवे ट्रैक के नीचे से सुरक्षित निकालना था। इंजीनियरों ने पूरी सावधानी के साथ यह काम पूरा किया। कई स्थानों पर सुरंग जमीन से करीब 120 फीट नीचे बनाई गई है। निर्माण एजेंसियों का दावा है कि आधुनिक तकनीक से तैयार की गई यह संरचना लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में भी सक्षम होगी।

अब हर गांव तक पहुंचेगा नर्मदा जल
स्लीमनाबाद टनल के शुरू होते ही पहली बार नर्मदा का पानी गुरुत्वाकर्षण के सहारे सोन नदी बेसिन तक पहुंचेगा। इसके लिए बिजली खर्च करने या बड़े पंप लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सरकार का अनुमान है कि परियोजना शुरू होने के शुरुआती महीनों में ही करीब एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र की रबी फसलों को सिंचाई का लाभ मिलने लगेगा। इससे पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और किसानों की उत्पादन क्षमता में भी सुधार आने की उम्मीद है।

2008 में शुरू हुआ सफर
इस महत्वाकांक्षी परियोजना का ठेका वर्ष 2008 में हैदराबाद की निर्माण कंपनी मेसर्स पटेल-एसईडब्ल्यू (संयुक्त उपक्रम) को दिया गया था। शुरुआत में इसकी अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपये तय की गई थी, लेकिन कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों, अतिरिक्त सुरक्षा उपायों, जल रिसाव रोकने की तकनीक और आधुनिक मशीनों के उपयोग के कारण परियोजना की लागत बढ़कर 1610.47 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। फिलहाल परियोजना का 96.66 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और मुख्य टनल के साथ ओपन कट नहर का निर्माण भी लगभग समाप्त हो गया है।

5 जिलों की खेती बदलेगी तस्वीर
स्लीमनाबाद टनल के चालू होने के बाद कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना के करीब 1450 गांवों को सालभर सिंचाई की बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद है। लगभग 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को इसका सीधा फायदा मिलेगा। सरकार का मानना है कि इससे खेती के साथ-साथ पेयजल व्यवस्था और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यह परियोजना केवल एक टनल नहीं, बल्कि विंध्य और महाकौशल क्षेत्र के विकास की नई पहचान बनने जा रही है।






