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तेजा दशमी आज: साहस और वचनबद्धता से जुड़ा लोक आस्था का पर्व, सीएम डॉ. मोहन यादव ने दी शुभकामनाएं

राजस्थान और मध्यप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में आज तेजा दशमी श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। यह पर्व लोकदेवता वीर तेजाजी की साहस, त्याग और वचन निभाने की गाथा से जुड़ा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए सुख-शांति और खुशहाली की कामना की है।
Teja Dashami

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आज तेजा दशमी है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला तेजा दशमी पर्व लोक आस्था और ग्रामीण लोकसंस्कृति से जुड़ा प्रमुख पर्व है। राजस्थान और मध्यप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में यह दिन लोकदेवता वीर तेजाजी महाराज की स्मृति में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। तेजाजी को लोकपरंपरा में साहस, सत्य, वचन पालन और गौ-रक्षा के लिए याद किया जाता है। इस अवसर पर ग्रामीण अंचलों में तेजाजी के मंदिरों और थानों पर पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन, जागरण और मेलों का आयोजन किया जाता है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तेजा दशमी पर प्रदेशवासियों को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि “लोकदेवता वीर तेजाजी महाराज के प्रति श्रद्धा और आस्था का यह पर्व हम सभी के जीवन में सुख-शांति और खुशहाली की वृद्धि लेकर आए तथा हर परिवार पर उनकी कृपा बनी रहे, यही मंगलकामना है।”

कौन थे वीर तेजाजी

लोकमान्यता के अनुसार वीर तेजाजी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल में हुआ था। उन्हें राजस्थान के प्रमुख लोकदेवताओं में माना जाता है। उनकी गाथा एक ऐसे लोकनायक के रूप में याद की जाती है जिन्होंने गायों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और संकट के बावजूद अपना वचन निभाया। इसी वजह से तेजाजी की लोक आस्था में सत्य, साहस, त्याग और वचनबद्धता को विशेष स्थान मिला है।

तेजा दशमी का महत्व

तेजा दशमी वीर तेजाजी से जुड़ी लोकगाथा और उनके बलिदान की स्मृति में मनाई जाती है। लोकविश्वास है कि उन्होंने अपना वचन पूरा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए थे। उन्हें सर्पदंश से रक्षा करने वाले लोकदेवता के रूप में भी पूजा जाता है। हालांकि उनकी जीवनगाथा से जुड़ी कई बातें लोककथाओं और मौखिक परंपराओं के रूप में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग ढंग से सुनाई जाती हैं।

वीर तेजाजी से जुड़ी कथा

लोककथा के अनुसार तेजाजी गायों को लुटेरों से बचाने के लिए निकले थे। इसी दौरान रास्ते में उनका सामना एक सर्प से हुआ। तेजाजी ने उससे कहा कि पहले वे गायों को सुरक्षित करेंगे और इसके बाद लौटकर उसके सामने उपस्थित होंगे। गायों को बचाने के बाद जब तेजाजी लौटे तो उनका शरीर कई जगह से घायल था। कथा के अनुसार, सांप ने उन्हें डसने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं होने की बात कही। तब तेजाजी ने अपनी जीभ आगे कर दी और अपना वचन पूरा किया। इसी प्रसंग से उनकी सर्पदंश से रक्षा करने वाले लोकदेवता के रूप में आस्था जुड़ी मानी जाती है।

राजस्थान से मध्यप्रदेश तक लोक आस्था का पर्व

तेजाजी की पूजा का प्रमुख केंद्र राजस्थान है। नागौर जिले का खरनाल उनकी जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है, जबकि परबतसर में उनके नाम से जुड़ा प्रसिद्ध मेला आयोजित होता है। मध्यप्रदेश में मालवा-निमाड़ सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजाजी के प्रति आस्था है। तेजा दशमी पर यहां तेजाजी के मंदिरों में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

तेजा दशमी पर तेजाजी के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन, जागरण, शोभायात्रा, मेले और भंडारे का आयोजन भी होता है। श्रद्धालु प्रसाद अर्पित कर वीर तेजाजी की गाथा का स्मरण करते हैं। ग्रामीण अंचलों में यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति और सामुदायिक मेलजोल से भी जुड़ा हुआ है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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