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बिहार में स्कूल-कॉलेजों के पास मीट-मछली की बिक्री पर प्रतिबंध, AIMIM ने पूछा- ‘90% हिंदू खाते हैं, बच्चों को प्रोटीन कैसे मिलेगा?’

Written by:Banshika Sharma
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बिहार सरकार ने शिक्षण संस्थानों और धार्मिक स्थलों के पास खुले में मीट और मछली की बिक्री पर रोक लगाने की अपनी नीति को स्पष्ट किया है। इस फैसले पर राजनीतिक बहस छिड़ गई है, जिसमें AIMIM ने इसे एक एजेंडा बताते हुए 90% हिंदुओं के मांसाहारी होने का दावा किया है, जबकि JDU ने इसे पुरानी नीति बताया है।
बिहार में स्कूल-कॉलेजों के पास मीट-मछली की बिक्री पर प्रतिबंध, AIMIM ने पूछा- ‘90% हिंदू खाते हैं, बच्चों को प्रोटीन कैसे मिलेगा?’

बिहार में शिक्षण संस्थानों और धार्मिक स्थलों के पास मांस-मछली की दुकानों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले पर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। जहां जनता दल यूनाइटेड (JDU) इसे एक पुरानी और स्वच्छता से जुड़ी नीति बता रही है, वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे एक खास एजेंडे का हिस्सा करार दिया है।

बिहार सरकार के इस कदम के बाद से ही इस पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सरकार का कहना है कि यह फैसला स्वच्छता और जनभावना को ध्यान में रखकर लिया गया है और इसमें कुछ भी नया नहीं है।

JDU ने किया नीति का बचाव

इस मामले पर JDU के प्रवक्ता नीरज कुमार ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया फैसला नहीं है, बल्कि सरकार की एक मौजूदा नीति है। उन्होंने कहा, “मंदिरों या मस्जिदों जैसे धार्मिक स्थलों के पास मांस बेचने वाली दुकानें पहले से ही प्रतिबंधित हैं। अब इसी नीति के तहत स्कूलों और कॉलेजों के पास भी मांस-मछली नहीं बिकेगी।” उन्होंने इस पर हो रहे विवाद को अनावश्यक बताया और कहा कि सरकार मछली क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है।

AIMIM का पलटवार: ‘यह हाइजीन नहीं, एजेंडा है’

दूसरी ओर, AIMIM की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष शोएब जमी ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे स्वच्छता का नहीं, बल्कि एक एजेंडे का मामला बताया। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए एक बड़ा दावा किया।

“यह मुख्य रूप से हाइजीन का मामला है। लेकिन अगर कोई मछली और मीट पर एतराज़ करता है, तो मैं यह बताना चाहूंगा कि देश में लगभग 90% हिंदू मछली और मीट खाते हैं।” — शोएब जमी, अध्यक्ष, AIMIM दिल्ली

शोएब जमी ने बच्चों के पोषण पर सवाल उठाते हुए कहा, “प्रोटीन कैसे मिलेगा बच्चों को? आप अमेरिका में देखिए, दुनिया भर के तमाम विश्वविद्यालयों में बच्चों को जो भोजन दिए जाते हैं, उसमें अंडे दिए जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि अगर गंदगी होती है तो उसके लिए कानून बनाना चाहिए, लेकिन इसे मांस-मछली तक सीमित करना ठीक नहीं है। उन्होंने सवाल किया, “होली में जब लंबी-लंबी लाइनें लगती हैं, तब आप क्यों नहीं बोलते? खुद इनके बच्चे जो अमेरिका में पढ़ते हैं, वो क्या खाते हैं, पूछिए इनसे।”

इमाम संघ ने दी संतुलित प्रतिक्रिया

इस विवाद पर अखिल भारतीय इमाम संघ के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने एक संतुलित दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने कहा, “यह अच्छी बात है कि धार्मिक स्थल और शिक्षण संस्थानों के आसपास मीट-मछली की दुकानें नहीं होनी चाहिए।” हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि हमें संविधान में दिए गए खाने के अधिकार का भी सम्मान करना चाहिए, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद का भोजन करने का अधिकार है।

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Banshika Sharma
लेखक के बारे में
मेरा नाम बंशिका शर्मा है। मैं एमपी ब्रेकिंग न्यूज़ में कंटेंट राइटर के तौर पर काम करती हूँ। मुझे समाज, राजनीति और आम लोगों से जुड़ी कहानियाँ लिखना पसंद है। कोशिश रहती है कि मेरी लिखी खबरें सरल भाषा में हों, ताकि हर पाठक उन्हें आसानी से समझ सके। View all posts by Banshika Sharma
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