जनसुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने सोमवार को सुपौल जिला मुख्यालय में बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने यह कहकर राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कोई भी हो, उसकी पहली प्राथमिकता राज्य के विकास और जनता के कल्याण की बजाय गुजरात होगा। किशोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भावी मुख्यमंत्री के पास वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति नहीं होगी और राज्य सरकार पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सीधे इशारों पर ही संचालित होगी। यह बयान उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान दिया, जिसने बिहार की राजनीति में केंद्र के बढ़ते हस्तक्षेप पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल पर भी निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के दौरान ही यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी थी कि नीतीश कुमार अगले पांच वर्षों तक मुख्यमंत्री पद पर नहीं बने रहेंगे। किशोर ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा कि नीतीश कुमार को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के कुल 202 विधायकों का वास्तविक और पूर्ण समर्थन कभी प्राप्त नहीं हुआ, जिससे उनकी सरकार की वैधता और स्थिरता पर लगातार प्रश्नचिह्न लगे रहे हैं। यह टिप्पणी मौजूदा राजनीतिक समीकरणों और भविष्य की संभावनाओं को लेकर कई अटकलें पैदा करती है।
प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रक्रिया पर लगाए गंभीर आरोप
चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रशांत किशोर ने बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि नीतीश कुमार ने बड़े पैमाने पर मतदाताओं को प्रभावित किया है। किशोर के अनुसार, मुख्यमंत्री ने 10 हजार रुपये देकर वोट खरीदे हैं और अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने चुनाव आयोग का भी खुलकर सहयोग लिया। ये सभी सनसनीखेज आरोप उन्होंने सुपौल जिला मुख्यालय स्थित नितमया होटल में आयोजित जनसुराज पार्टी की बैठक में पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के सामने साझा किए, जहां आगामी चुनावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श चल रहा था। इन आरोपों ने बिहार में चुनावी शुचिता पर नई बहस छेड़ दी है।
किशोर ने आगे कहा कि बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला कोई भी व्यक्ति महज एक कठपुतली होगा। उसके पास राज्य के हित में कोई भी बड़ा या स्वतंत्र निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति नहीं होगी, क्योंकि हर महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला और प्रशासनिक निर्देश दिल्ली से, यानी प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह की जोड़ी द्वारा ही तय किया जाएगा। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संभावित मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर भी कई तीखे सवाल खड़े किए। किशोर का इशारा था कि प्रदेश भाजपा का कोई भी नेता, चाहे वह कितना भी कद्दावर क्यों न हो, केंद्र के प्रभाव और निर्देशों से मुक्त होकर काम नहीं कर पाएगा, जिससे बिहार के नेतृत्व की स्वायत्तता पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
सुपौल में आयोजित इस बैठक का मुख्य उद्देश्य जनसुराज पार्टी के संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत बनाना था। प्रशांत किशोर ने दूर-दराज के इलाकों से आए कार्यकर्ताओं से मौजूदा हालात, ग्रामीण क्षेत्रों की गंभीर समस्याएं, जनता की अपेक्षाएं और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर विस्तृत फीडबैक लिया। संगठन की वर्तमान स्थिति की गहन समीक्षा की गई, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी एक प्रभावी शक्ति के रूप में उभर सके और बेहतर प्रदर्शन कर सके। बैठक में चुनावी रणनीति तैयार करने, संभावित उम्मीदवारों के चयन यानी टिकट बंटवारे के मापदंडों और पिछली हार के गहन कारणों पर विस्तार से मंथन हुआ। सभी कार्यकर्ताओं ने मिलकर अगले चुनाव में पूरी एकजुटता और समर्पण के साथ लड़ने का संकल्प लिया, ताकि पार्टी के लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। बूथ स्तर तक पार्टी की सक्रियता बढ़ाने, आम जनता से सीधा जुड़ाव स्थापित करने और उनकी समस्याओं को उठाने पर विशेष जोर दिया गया। किशोर ने कार्यकर्ताओं को समझाया कि जनता के बीच जाकर ही वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है।
प्रशांत किशोर ने एक करोड़ रोजगार वादे को बताया चुनावी जुमला
विकास और रोजगार के मोर्चे पर, प्रशांत किशोर ने केंद्र की एनडीए सरकार द्वारा किए गए ‘एक करोड़ रोजगार’ के वादे को सिरे से खारिज करते हुए उसे केवल एक ‘चुनावी जुमला’ करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह के बड़े वादों को पूरा करना व्यावहारिक रूप से असंभव है और यह सिर्फ जनता को गुमराह करने का एक तरीका है। बिहार में बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भी उन्होंने अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। किशोर ने कहा कि इन गंभीर सामाजिक समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण पाने और राज्य में कानून व्यवस्था स्थापित करने के लिए एक मजबूत, दूरदर्शी और ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, जो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कहीं भी दिखाई नहीं देती है। उनके मुताबिक, मौजूदा नेतृत्व में इन चुनौतियों से निपटने और राज्य को सही दिशा देने का वास्तविक संकल्प और दूरदर्शिता का अभाव है।
प्रशांत किशोर ने बिहार की आम जनता से भी एक भावुक और विचारोत्तेजक अपील की। उन्होंने लोगों से कहा कि वे जाति, धर्म और सरकारी योजनाओं के तात्कालिक लाभ के आधार पर वोट देने की अपनी पुरानी और हानिकारक प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करें। किशोर का स्पष्ट मत था कि यदि मतदान का यह तरीका जारी रहता है और लोग अपने विवेक का इस्तेमाल करके सही नेतृत्व का चुनाव नहीं करते, तो आने वाले वर्षों में राज्य की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव नहीं आएगा। उनके अनुसार, बिहार की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब जनता अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग सोच-समझकर, विकास, सुशासन और योग्य नेतृत्व के मुद्दों पर करे, न कि भावनात्मक जुड़ाव या क्षणिक लाभ के आधार पर। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो बिहार हमेशा पिछड़ा रहेगा।






