गुड न्यूज की उम्मीद, ट्रेड डील को लेकर भारत-अमेरिका के बीच बनी सहमति की जमीन

गुड न्यूज की उम्मीद, ट्रेड डील को लेकर भारत-अमेरिका के बीच बनी सहमति की जमीन

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार बातचीत अब आखिरी दौर में पहुंच गई है। हाल ही में वॉशिंगटन में 14 से 17 जुलाई तक दोनों देशों के बीच पांचवें दौर की वार्ता हुई। इस बैठक में डील का अंतिम मसौदा तैयार करने पर बातचीत हुई। माना जा रहा है कि जल्द ही इस डील पर औपचारिक मुहर लग सकती है। भारत के लिए यह समझौता बेहद अहम है क्योंकि इससे वह अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ (जवाबी शुल्क) से बच सकता है। अमेरिका ने 1 अगस्त 2025 से भारत पर 26% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है, अगर इस बीच डील फाइनल नहीं हुई।

किन मुद्दों पर हुई बातचीत?

इस बार की बातचीत सिर्फ सामान के आयात-निर्यात तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल इकॉनॉमी, हाई-टेक्नोलॉजी ट्रेड और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उत्पादों (SCOMET) तक फैली रही। भारत की मांग रही कि अमेरिका उसके ऑटो सेक्टर पर 25% और स्टील-एल्युमिनियम जैसे उत्पादों पर 50% टैरिफ में राहत दे। वहीं अमेरिका चाह रहा है कि भारत कृषि और डेयरी उत्पादों में अपने दरवाजे थोड़ा और खोले। SCOMET यानी स्पेशल केमिकल्स, ऑर्गेनिज्म्स, मटेरियल्स, इक्विपमेंट्स और टेक्नोलॉजी का व्यापार सिर्फ भरोसेमंद देशों से होता है। इस डील के तहत अमेरिका भारत को ऐसी तकनीकों के लिए ‘विश्वसनीय पार्टनर’ मान सकता है।

अमेरिका की क्या डिमांड है?

अमेरिका चाहता है कि भारत कृषि और डेयरी प्रोडक्ट्स पर आयात शुल्क घटाए। साथ ही वह जेनेटिकली मोडिफाइड फसलों (GM crops) के लिए भी भारत का बाजार खोलना चाहता है। इसके अलावा अमेरिका की कोशिश है कि भारत ऑटोमोबाइल सेक्टर पर ड्यूटी कम करे और अमेरिका से ज्यादा एनर्जी प्रोडक्ट्स (जैसे एलएनजी और तेल) खरीदे। टेक्नोलॉजी के मामले में अमेरिका चाहता है कि भारत में उसके टेक कंपनियों के लिए नियमों में नरमी लाई जाए और उन्हें अधिक स्वतंत्रता मिले।

भारत की मांग और रणनीति

भारत की प्राथमिकता है कि वह अपने किसानों और डेयरी उद्योग की रक्षा करे। इसलिए वह कृषि उत्पादों में बहुत ज्यादा रियायत देने के मूड में नहीं है। खासतौर पर चावल, गेहूं और दूध जैसे उत्पादों पर सुरक्षा जरूरी मानी जा रही है। इसके साथ ही भारत चाहता है कि उसके श्रम-प्रधान और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को अमेरिका में ज्यादा बाजार मिले। इससे भारत को रोजगार और निवेश बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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