रायपुर: छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण विरोधी विधेयक को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़-जे (जेसीसी-जे) के सुप्रीमो अमित जोगी ने गुरुवार को रायपुर स्थित राजभवन पहुंचकर इस विधेयक का कड़ा विरोध किया। उन्होंने विरोध स्वरूप विधेयक की एक प्रति जलाई और राज्यपाल के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
अमित जोगी ने विधानसभा के मौजूदा सत्र में इस विधेयक को जल्दबाजी में पेश करने पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है, जिस पर व्यापक चर्चा और सभी हितधारकों से परामर्श के बिना कानून बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। उन्होंने इस कदम को सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरा बताया।
विधेयक के प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति
जेसीसी-जे अध्यक्ष ने विधेयक के कई प्रावधानों को सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रहार बताया। उन्होंने कहा कि यह कानून केवल किसी एक समुदाय से नहीं, बल्कि हर नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वायत्तता और निजता के अधिकार से जुड़ा है।
उन्होंने विधेयक के कुछ विवादास्पद बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
- प्रलोभन की व्यापक परिभाषा: विधेयक में ‘प्रलोभन’ की परिभाषा इतनी विस्तृत रखी गई है कि शिक्षा, सामाजिक सेवा और बेहतर जीवन स्तर देने जैसे कार्यों को भी संदेह के दायरे में लाया जा सकता है।
- धर्म प्रचार के अधिकार का उल्लंघन: ‘प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रेरणा’ को अपराध मानना संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धर्म के प्रचार के अधिकार का हनन है।
- प्रशासनिक नियंत्रण: धर्म परिवर्तन के लिए जिला प्रशासन से पूर्व सूचना और जांच की शर्त व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और अंतरात्मा के अधिकार पर सीधा प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करती है।
- विवाह को शून्य करना: इस कानून के तहत विवाह को शून्य घोषित करने का प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है और यह सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों के भी विपरीत है।
- कठोर दंड: विधेयक में गैर-जमानती और कठोर दंड के प्रावधान इसे एक दमनकारी कानून बना सकते हैं।
“यह विधेयक धर्मांतरण को नियंत्रित करने के नाम पर वास्तव में व्यक्ति की अंतरात्मा और आस्था पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास है। लोकतंत्र में कानून संवाद और सहमति से बनते हैं, न कि जल्दबाजी और आशंका के आधार पर।”- अमित जोगी, सुप्रीमो, जेसीसी-जे
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों का दिया हवाला
अमित जोगी ने यह भी रेखांकित किया कि धर्मांतरण से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। उन्होंने कहा, “ऐसे समय में जब देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले पर विचार कर रही है, राज्य सरकार द्वारा इस तरह का विधायी हस्तक्षेप करना संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है।”
सरकार से की ये मांगें
अपने ज्ञापन में जोगी ने राज्य सरकार से विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार को इस पर कोई भी कदम उठाने से पहले निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:
1. सभी सामाजिक, धार्मिक और आदिवासी संगठनों सहित सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श किया जाए।
2. विधानसभा में इस विधेयक पर चर्चा के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
3. सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जाए।
जोगी ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इस विधेयक का हर स्तर पर विरोध जारी रखेगी, क्योंकि यह छत्तीसगढ़ के सामाजिक ताने-बाने और संवैधानिक मूल्यों के लिए एक गंभीर खतरा है।






