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छत्तीसगढ़ में RTE फीस 13 साल से न बढ़ने पर निजी स्कूलों ने खोला मोर्चा, सरकार को असहयोग आंदोलन की दी चेतावनी

Written by:Ankita Chourdia
Published:
छत्तीसगढ़ में शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत गरीब बच्चों के दाखिले पर संकट खड़ा हो गया है। प्रदेश के निजी स्कूल संचालकों ने 13 वर्षों से फीस नहीं बढ़ाए जाने के विरोध में सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन की चेतावनी दी है, जिससे आने वाले शैक्षणिक सत्र में दाखिलों को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
छत्तीसगढ़ में RTE फीस 13 साल से न बढ़ने पर निजी स्कूलों ने खोला मोर्चा, सरकार को असहयोग आंदोलन की दी चेतावनी

रायपुर: छत्तीसगढ़ में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले ही शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश के प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चेतावनी दी है कि अगर RTE के तहत प्रति छात्र मिलने वाली फीस में बढ़ोतरी नहीं की गई, तो वे असहयोग आंदोलन शुरू कर देंगे। स्कूल संचालकों ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है, जिससे हजारों गरीब बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है।

यह पूरा विवाद पिछले 13 सालों से फीस की राशि में कोई वृद्धि न होने को लेकर है। स्कूल संचालकों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के बीच पुरानी दरों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना असंभव होता जा रहा है।

क्या है फीस का पूरा गणित?

छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अनुसार, सरकार वर्तमान में आरटीई के तहत प्राइमरी स्तर के एक बच्चे के लिए प्रति सत्र केवल 7,000 रुपये का भुगतान करती है। स्कूलों की मांग है कि इसे बढ़ाकर 18,000 रुपये किया जाए। इसी तरह, मिडिल स्कूल के लिए यह राशि 11,500 रुपये से बढ़ाकर 22,000 रुपये और 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए 15,000 रुपये से 25,000 रुपये करने की मांग की जा रही है।

एसोसिएशन ने पड़ोसी राज्यों का हवाला देते हुए कहा है कि दिल्ली में न्यूनतम 25,000 रुपये और राजस्थान में 16,000 रुपये प्रति छात्र दिए जाते हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में यह राशि काफी कम है।

असहयोग आंदोलन से बच्चों पर क्या होगा असर?

स्कूल संचालकों ने स्पष्ट किया है कि उनके आंदोलन का असर सीधे तौर पर बच्चों की पढ़ाई पर नहीं पड़ेगा। एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता के मुताबिक, असहयोग आंदोलन के तहत स्कूल सरकारी कार्यक्रमों में सहयोग देना बंद करेंगे।

“हमारा उद्देश्य गरीब बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करना नहीं है। असहयोग का मतलब है कि हम सरकारी आयोजनों के लिए अपनी बसें नहीं देंगे, चुनाव या अन्य कामों में अपने स्टाफ की ड्यूटी नहीं लगने देंगे और अन्य प्रशासनिक सहयोग से पीछे हट जाएंगे।”- राजीव गुप्ता, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन

गुप्ता ने यह भी बताया कि फीस वृद्धि के मामले में हाईकोर्ट का फैसला उनके पक्ष में आ चुका है, लेकिन सरकार उसे लागू करने में देरी कर रही है।

एंट्री क्लास का विवाद भी पहुंचा कोर्ट

फीस के अलावा, दाखिले की कक्षा को लेकर भी सरकार और निजी स्कूलों के बीच टकराव की स्थिति है। सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है जिसके अनुसार, आरटीई के तहत दाखिला अब सिर्फ पहली कक्षा में ही होगा। इससे पहले, नियम यह था कि स्कूल जिस कक्षा से शुरू होता है (एंट्री क्लास, जैसे नर्सरी या केजी-1), वहां से दाखिले दिए जाते थे। स्कूलों ने सरकार के इस फैसले को तकनीकी रूप से गलत बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी है, क्योंकि इससे आरटीई की सीटें कम होने की आशंका है।

सरकार का पक्ष और शिक्षा मंत्री का बयान

निजी स्कूलों की चेतावनी के बाद सरकारी महकमे में भी हलचल तेज हो गई है। प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने कहा है कि सरकार एसोसिएशन के पत्र पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने कहा, “आरटीई फीस का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार से आता है। राज्य का हिस्सा इसमें कम होता है। हम इस मामले को लेकर केंद्र सरकार को पत्र लिखेंगे, ताकि फीस बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जा सके।” अब देखना यह होगा कि सरकार और स्कूलों के बीच यह गतिरोध कब और कैसे समाप्त होता है।

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