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छत्तीसगढ़ के इस गांव में लौटी खुशियां, आजादी के बाद पहली बार खेली गई होली, ग्रामीणों ने एक-दूसरे को रंग लगाकर दी बधाई

Written by:Ankita Chourdia
Published:
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में इस बार होली की तस्वीर बदली हुई दिखी। कांकेर और महासमुंद के पुनर्वास केंद्रों में कुल 55 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने रंग-गुलाल के साथ त्योहार मनाया, जबकि नारायणपुर के अबूझमाड़ के कुतुल क्षेत्र में आजादी के बाद पहली बार ग्रामीणों ने खुले तौर पर होली खेली। प्रशासन और सुरक्षा बल इसे पुनर्वास नीति और नक्सल-मुक्ति अभियान के असर के तौर पर देख रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के इस गांव में लौटी खुशियां, आजादी के बाद पहली बार खेली गई होली, ग्रामीणों ने एक-दूसरे को रंग लगाकर दी बधाई

जिन इलाकों में वर्षों तक त्योहारों की जगह तनाव और बंदूक की आवाजें चर्चा में रहती थीं, वहां इस बार होली रंग और मेल-मिलाप के साथ दर्ज हुई। छत्तीसगढ़ के कांकेर, नारायणपुर और महासमुंद में आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों ने पुनर्वास केंद्रों और गांवों में होली खेली। सबसे अहम संकेत यह रहा कि कई जगहों पर पुलिसकर्मियों, प्रशासन और पूर्व उग्रवादियों ने एक-दूसरे को रंग लगाया।

कांकेर जिले के भानुप्रतापुर स्थित मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में रहने वाले आत्मसमर्पित नक्सलियों ने बुधवार, 4 मार्च को पहली बार सामूहिक रूप से होली मनाई। यह केंद्र फिलहाल 40 सरेंडर नक्सलियों के पुनर्वास का प्रमुख ठिकाना है। यहां उन्हें सिलाई, ड्राइविंग और मैकेनिक कार्य जैसे कौशल प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, ताकि वे मुख्यधारा में लौटकर रोजगार आधारित जीवन शुरू कर सकें।

दूसरी ओर, महासमुंद जिले में बीबीएम डिवीजन के 15 नक्सलियों ने दो दिन पहले आत्मसमर्पण किया था। 4 मार्च को इन्होंने भी पुनर्वास केंद्र में होली खेली। इस कार्यक्रम का वीडियो राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया।

सरेंडर नक्सलियों के चेहरों की मुस्कान बताती है कि पुनर्वास सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नए जीवन की शुरुआत है।- गृहमंत्री विजय शर्मा

कांकेर में पुनर्वास मॉडल: प्रशिक्षण के साथ सामाजिक वापसी

भानुप्रतापुर के मुल्ला चौगेल केंद्र में रह रहे 40 आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए प्रशासन ने केवल आवासीय व्यवस्था नहीं, बल्कि कौशल आधारित पुनर्स्थापन की योजना लागू की है। अधिकारियों का कहना है कि लक्ष्य सिर्फ हथियार छुड़वाना नहीं, बल्कि युवाओं को स्थायी तौर पर सामान्य सामाजिक जीवन में स्थापित करना है।

होली आयोजन के दौरान प्रशासनिक अधिकारी भी केंद्र पहुंचे और मुख्यधारा में लौटे युवाओं को शुभकामनाएं दीं। अधिकारियों ने दोहराया कि शासन की पुनर्वास नीति भटके हुए युवाओं को सम्मानजनक तरीके से समाज में वापस लाने पर केंद्रित है। यही वजह है कि प्रशिक्षण, परामर्श और सामाजिक संपर्क-तीनों स्तर पर काम किया जा रहा है।

नारायणपुर के अबूझमाड़ में बदला माहौल, कुतुल क्षेत्र में पहली सार्वजनिक होली

नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों के कारण संवेदनशील माना जाता रहा है। इसी इलाके का कुतुल क्षेत्र, जिसे कभी नक्सलियों का प्रभावी गढ़ कहा जाता था, इस बार अलग वजह से चर्चा में रहा। यहां आजादी के बाद पहली बार होली सार्वजनिक रूप से मनाई गई।

ग्रामीणों और बच्चों ने बिना डर त्योहार में भाग लिया। स्थानीय स्तर पर इसे सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सुरक्षा और प्रशासनिक उपस्थिति पर बढ़ते भरोसे की घटना के रूप में देखा जा रहा है। सुरक्षा बलों और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों के बाद इलाके में सामान्य गतिविधियों के लिए जो स्पेस बना है, होली का यह आयोजन उसी बदलाव का दृश्य संकेत बना।

कई स्थानों पर पूर्व नक्सलियों और पुलिसकर्मियों का एक साथ रंग खेलना भी उल्लेखनीय रहा। यह दृश्य उन इलाकों में प्रतीकात्मक महत्व रखता है, जहां पहले दोनों पक्षों के बीच सीधा संघर्ष होता था।

महासमुंद में हालिया आत्मसमर्पण के बाद पहली सामूहिक होली

महासमुंद जिले में बीबीएम डिवीजन के 15 नक्सलियों का आत्मसमर्पण हाल की महत्वपूर्ण कार्रवाई मानी जा रही है। आत्मसमर्पण के दो दिन बाद ही इनका पुनर्वास केंद्र में होली उत्सव में शामिल होना प्रशासन के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे यह संदेश भी गया कि सरेंडर के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया सक्रिय रूप से शुरू की जा रही है, न कि केवल औपचारिक कागजी कार्रवाई तक सीमित रखी जा रही है।

राज्य के नक्सल प्रभावित जिलों में पिछले कुछ समय से चल रही रणनीति में सुरक्षा कार्रवाई, स्थानीय प्रशासनिक पहुंच और पुनर्वास नीतियों को एक साथ रखा गया है। कांकेर और महासमुंद के केंद्रों में रंगों के बीच दिखी भागीदारी तथा नारायणपुर के कुतुल क्षेत्र में पहली होली-इन तीनों घटनाओं को इसी व्यापक प्रयास के ठोस परिणाम के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

कुल तस्वीर यह है कि 4 मार्च को छत्तीसगढ़ के तीन जिलों से आई होली की खबर सिर्फ त्योहार की नहीं रही, बल्कि संघर्ष से सामान्य जीवन की ओर लौटते सामाजिक संक्रमण की भी रही।

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Ankita Chourdia
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