सोचिए, जिस समय एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की जरूरत थी, उस समय गांव के लोग उसे कपड़े की डोली में उठाकर पैदल चलने को मजबूर थे। छिंदवाड़ा जिले के चीटीपाठा गांव में गुरुवार को ऐसा ही हुआ। प्रसव पीड़ा से परेशान 22 वर्षीय कुस्तरिया को ग्रामीणों ने लकड़ी और कपड़े से बनी डोली में रखा और करीब 8 किलोमीटर तक पैदल चले। रास्ता खत्म होने के बाद एंबुलेंस मिली और महिला को अस्पताल ले जाया गया।
अस्पताल पहुंचने के बाद महिला ने एक मृत बच्चे को जन्म दिया। महिला की हालत गंभीर बताई जा रही है और उसे ICU में भर्ती किया गया है। इस घटना ने गांव की सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रात में शुरू हुई प्रसव पीड़ा
ग्राम पंचायत गोप के मजरे टोले चीटीपाठा यानी जामुनडोगा में रहने वाले सोनू मलगाम की 22 वर्षीय पत्नी कुस्तरिया को बुधवार रात अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिवार के लोगों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि महिला को अस्पताल तक कैसे पहुंचाया जाए।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव तक एंबुलेंस या दूसरी गाड़ी पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है। रास्ता उबड़-खाबड़ है और ऐसे समय में वाहन ले जाना मुश्किल हो जाता है। परिवार ने मदद के लिए ग्रामीणों से संपर्क किया।
8 किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर ले गए ग्रामीण
कुस्तरिया को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को करीब 8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। यह सफर सामान्य स्थिति में भी आसान नहीं है, लेकिन गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के बीच इस तरह ले जाना बेहद मुश्किल था।
ग्रामीणों के सामने उस समय सिर्फ एक ही चिंता थी कि महिला को किसी तरह जल्द से जल्द अस्पताल तक पहुंचाया जाए। रास्ते में महिला की हालत कैसी रही, यह परिवार और ग्रामीण ही जानते हैं। करीब 8 किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद महिला को ग्राम पंचायत भवन गोप तक पहुंचाया गया। यहीं से 108 एंबुलेंस की मदद मिल सकी। इसके बाद महिला को प्राथमिक उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दमुआ ले जाया गया।
दमुआ से जिला अस्पताल किया गया रेफर
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दमुआ में डॉक्टरों ने महिला की हालत देखी। उसकी स्थिति गंभीर होने के कारण उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। इसके बाद महिला को जिला अस्पताल ले जाया गया। यहां इलाज के दौरान उसने मृत बच्चे को जन्म दिया। महिला की हालत गंभीर होने के कारण उसे ICU में भर्ती किया गया है।
इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर गांव तक सड़क होती और एंबुलेंस समय पर पहुंच पाती तो क्या हालात अलग हो सकते थे? इस सवाल का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन घटना ने ग्रामीण इलाकों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधा के बीच के संबंध को जरूर सामने ला दिया है।
2016 से पक्की सड़क का इंतजार
गांव की सरपंच सियाबती कंचनशाह नर्रे के मुताबिक, चीटीपाठा गांव में पक्की सड़क की मांग कोई नई नहीं है। उनका कहना है कि सड़क निर्माण के लिए वर्ष 2016 से ग्राम सभा के माध्यम से कई बार प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। सरपंच के अनुसार मुख्यमंत्री, कलेक्टर और स्थानीय विधायक तक सड़क निर्माण की मांग पहुंचाई गई, लेकिन अभी तक गांव को पक्की सड़क नहीं मिल सकी है।
अगर यह दावा सही है कि करीब 10 साल से सड़क निर्माण के लिए प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं, तो यह प्रशासन के लिए जांच का विषय है कि अब तक इस समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाया।
गांव वालों का दावा, पहले भी हो चुकी हैं मौतें
ग्रामीण अनिल मलगाम और दिनेश मलगाम ने बताया कि सड़क और समय पर स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलने की परेशानी सिर्फ कुस्तरिया के मामले तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का दावा है कि इससे पहले भी गांव की कविता मलगाम, गौरा वरकडे और मनवती नर्रे की मौत हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि इन मामलों में भी समय पर इलाज और एंबुलेंस की सुविधा नहीं मिल पाई थी।
इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में यह जरूरी है कि प्रशासन इन मामलों की भी जानकारी जुटाए और यह पता लगाए कि संबंधित महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने में क्या परेशानी हुई थी।
सड़क सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं
किसी गांव में सड़क नहीं होने की समस्या सिर्फ रोजमर्रा की आवाजाही तक सीमित नहीं रहती। इसका सीधा असर मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है।
खासकर गर्भवती महिला के लिए प्रसव के समय हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में अगर एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाए और मरीज को कई किलोमीटर पैदल ले जाना पड़े, तो परेशानी और बढ़ जाती है।
महिला की हालत पर भी नजर
फिलहाल कुस्तरिया का इलाज जिला अस्पताल में चल रहा है। मृत बच्चे के जन्म के बाद महिला की हालत गंभीर बताई गई है और उसे ICU में रखा गया है।परिवार के लिए यह समय बेहद मुश्किल है। एक तरफ बच्चे को खोने का दुख है और दूसरी तरफ महिला की सेहत को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में महिला को बेहतर इलाज मिलना सबसे जरूरी है।






