आदेश के 6 महीने बाद भी नहीं मिला अर्जित अवकाश का पैसा, चार बार लौटा बिल, दिवंगत शिक्षक की पत्नी लगा रहीं दफ्तरों के चक्कर

लोक शिक्षण संचालनालय ने 10 फरवरी को दी थी 32 दिन के अर्जित अवकाश की स्वीकृति, करीब 65 हजार रुपये के भुगतान के लिए चार बार कोषालय पहुंचा बिल
Directorate of Public Instruction Bhopal

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डबरा/ग्वालियर। शिक्षा विभाग से 32 दिन के अर्जित अवकाश नकदीकरण की मंजूरी मिलने के करीब छह महीने बाद भी दिवंगत शिक्षक के परिवार को भुगतान नहीं मिल पाया है। करीब 65,587 रुपये के भुगतान के लिए बिल चार बार कोषालय भेजा जा चुका है, लेकिन हर बार आपत्ति के साथ वापस लौटने के कारण मामला अटका हुआ है।

मामला डबरा के शासकीय प्राथमिक विद्यालय में पदस्थ रहे स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद उपाध्याय से जुड़ा है। जिला शिक्षा अधिकारी ग्वालियर के प्रस्ताव पर लोक शिक्षण संचालनालय ने 10 फरवरी 2026 को आदेश जारी कर उनके 32 दिन के अर्जित अवकाश संचयन की पात्रता को कार्योत्तर स्वीकृति दी थी।

मंजूरी भोपाल से मिली, भुगतान ग्वालियर में अटका

लोक शिक्षण संचालनालय के आदेश के बाद भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई। जानकारी के मुताबिक BEO डबरा कार्यालय की ओर से करीब 65,587 रुपये का बिल जिला कोषालय ग्वालियर भेजा गया, लेकिन बिल का भुगतान नहीं हो सका। अब तक करीब चार बार बिल प्रस्तुत किया जा चुका है और हर बार आपत्ति के बाद वापस लौट आया। यही वजह है कि विभागीय स्वीकृति के बावजूद राशि परिवार तक नहीं पहुंच पाई है।

पति के देय भुगतान के लिए भटक रहीं पत्नी

भुगतान अटकने का खामियाजा स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद उपाध्याय की पत्नी हीरा उपाध्याय को भुगतना पड़ रहा है। उन्हें पति के अर्जित अवकाश नकदीकरण की राशि के लिए संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

मामला इसलिए भी सवाल खड़े करता है क्योंकि अर्जित अवकाश की पात्रता को लेकर लोक शिक्षण संचालनालय का आदेश पहले ही जारी हो चुका है। इसके बावजूद BEO कार्यालय से कोषालय तक की प्रक्रिया में बिल की आपत्तियां दूर नहीं हो सकी हैं।

अब परिवार को इंतजार है कि विभाग और कोषालय के स्तर पर बिल में आ रही आपत्तियों का समाधान हो और करीब छह महीने से लंबित 65,587 रुपये का भुगतान मिल सके।

Atul Saxena
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पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव.

पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena →
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