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डबरा सिविल अस्पताल में जन्म प्रमाणपत्र के लिए अवैध वसूली, जिम्मेदार मौन, ग्रामीण परेशान

Reported by:Arun Rajak|Edited by:Atul Saxena
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ग्वालियर जिले के सिविल अस्पताल डबरा में जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाहियों के मामले लगातार सामने आते रहते हैं लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।  
डबरा सिविल अस्पताल में जन्म प्रमाणपत्र के लिए अवैध वसूली, जिम्मेदार मौन, ग्रामीण परेशान

Dabra Civil Hospital

ग्वालियर जिले के डबरा सिविल अस्पताल में जन्म प्रमाणपत्र के लिए अवैध वसूली का खेल चल रहा है, ग्रामीणों की मानें तो उनसे जन्म प्रमाणपत्र के बदले 250 से 300 रुपये तक लिए जाते हैं  जबकि ये सरकार की तरफ से निःशुल्क व्यवस्था है। बड़ी बात ये है कि अस्पताल की कई शिकायतें ग्वालियर में बैठे सीएमएचओ तक की जा चुकी हैं, जिला प्रशासन के अफसरों तक की गई है लेकिन सब मौन हैं।

सिविल अस्पताल पहुंचें एक परिजन ने इसका खुलासा करते हुए कहा कि जन्म प्रमाणपत्र फ्री में बनाने के निर्देश के बावजूद यहाँ पैसे वसूले जा रहे हैं, डबरा निवासी गोविंद कुशवाहा ने बताया कि वह अपने बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने डबरा सिविल अस्पताल पहुंचे थे, उनके बेटे का जन्म 3 साल पहले हुआ था, यहाँ जन्म प्रमाण पत्र शाखा में बैठे कर्मचारी ने उनसे जन्म प्रमाण पत्र बनाने के बदले में ढाई सौ रुपये मांगे, उसने कहा जन्म प्रमाण पत्र में लगाने के लिए चालान और एफिडेविट लगता है जिसमें पैसे लगते है अब सवाल ये है कि जब सुविधा निःशुल्क है तो कर्मचारी किसके कहने पर अवैध वसूली कर रहा है।

ये कहता है सरकारी नियम 

आपको बता दें मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी अस्पतालों में जन्म प्रमाणपत्र बनाने की सुविधा दी है, नियम के अनुसार सरकारी अस्पताल में प्रसव होने पर डिस्चार्ज टिकट के साथ ही निःशुल्क जन्म प्रमाणपत्र दिया जाता है वहीं निजी अस्पताल में प्रसव होने पर 21 दिन के अन्दर नगर निगम, नगर पालिका, पंचायत में आवेदन करना होता है वहां से भी निःशुल्क जन्म प्रमाणपत्र दिया जाता है, 21 से 30 दिन के अन्दर 2 रुपये, एक साल तक 5 रुपये और एक साल से अधिक होने पर 10 रुपये लेकर जन्म प्रमाणपत्र दिया जाने का नियम है लेकिन डबरा में इस नियम से अलग अपनी मनमानी चल रही है।

प्रसव के लिए भी पैसे मांगने का आरोप 

सिविल अस्पताल में ये एक ही आरोप नहीं है, ग्रामीणों का कहना है कि जब महिला का प्रसव होता  है तो उस वक्त भी जच्चा के अटेंडरों से डिलीवरी करवाने के बदले में स्टाफ पैसों की मांग करता है नहीं तो सही से डिलीवरी न करने की धमकियां उन्हें मिलती हैं। हालांकि लेबर रूम होने के कारण अटेंडरों पर स्टाफ के इस कारनामे का कोई सबूत नहीं मिल पाता लेकिन इन मामलों की मौखिक और लिखित शिकायतें कई बार प्रशासनिक अधिकारियों से की गई है।

जन प्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में 

डबरा सिविल अस्पताल कहने को तो आसपास के क्षेत्र के लिए एक वरदान है लेकिन कुछ अधिकारी और जनप्रतिनिधियों की लापरवाही से इस अस्पताल की दशा दिन पर दिन बत्तर होती जा रही है। जिस पर ना तो कोई जिम्मेदार जनप्रतिनिधि डबरा की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए आगे आरहा है और ना हीं कोई जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं।

BMO कुछ भी बोलने से करते हैं इंकार  

बड़ी बात तो यहां है कि अगर इस मामले को लेकर किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या फिर सिविल अस्पताल के बीएमओ से बात की जाती है तो वह मीडिया कर्मियों पर भड़कते हुए किसी भी मामले पर कुछ भी बोलने से साफ बना कर देते हैं इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि डबरा सिविल अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को बिगाड़ने और इसे शह देने के लिए के लिए कौन कहां तक जिम्मेदार है।

बड़े अफसरों का हर बार एक ही जवाब… दिखवाते हैं ..

क्योंकि ऐसा नहीं है कि यह मामले वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में ना हो लगातार अलग-अलग मीडिया संस्थानों द्वारा इस तरह के मामलों को अक्सर उठाया जाता रहा हैं जो कि जिला अधिकारी एवं अन्य जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंचते हैं लेकिन इस पर कोई भी जिम्मेदारी से काम करने को तैयार नहीं है। सभी का कहना होता है कि यह मामला अभी संज्ञान में आया है इसे दिखाया जाएगा या फिर कार्रवाई की जाएगी लेकिन इस रटे हुए बयान के बाद जमीनी स्तर पर होता कुछ नहीं है सब वैसा की वैसा रहता है। अब बड़ा सवाल तो यह है कि जब अधिकारी मामले को संज्ञान में ले लेते हैं और उन्हें दिखवाने की बात कहते हैं तो फिर अब तक इस तरह के मामलों में सुधार क्यों नहीं हुआ?

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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