CORONA: मंदिर-मॉल पर ताले, लॉक डाउन के डर से बाजारों में उमड़ रही भारी भीड़

CORONA: मंदिर-मॉल पर ताले, लॉक डाउन के डर से बाजारों में उमड़ रही भारी भीड़

ग्वालियर।अतुल सक्सेना।

कोरोना वायरस से बचने के लिए जागरुकता को लेकर सरकार अपनी तरफ से सभी प्रयास कर रही है बावजूद इसके लोगों को इसका भय सता रहा है। कुछ जगह समझदारी दिखाई जा रही है तो कुछ जगह लोग ना समझी का परिचय दे रहे हैं। ग्वालियर में समझदारी और नासमझी दोनों के उदाहरण देखने को मिल रहे हैं।

सरकार सहित जानकार लोग कोरोना से बचाव के लिए भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों से बचने, एक जगह पर ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने के लिए मना कर रहे हैं जिसके चलते ग्वालियर के प्रसिद्ध और पुराने मंदिरों पर ताले लग गए हैं। शहर के रियासतकालीन अचलेश्वर महादेव मंदिर और साईं बाबा मंदिर पर रोज सेंकड़ों की भीड़ दर्शनों के लिए पहुंचती है इसलिए दोनों मंदिरों के प्रबंधन ने आगामी आदेश तक मंदिरों पर ताले लगा दिये हैं। और इसकी सूचना भी लगा दी है। इसके अलावा शहर के मॉल, सिनेमाघर, शराब के अहाते सहित वो सभी जगह जहाँ भीड़ जुटती है सब बंद कर दिये गये हैं।

उधर कोरोना के भय के चलते एक अफवाह शहर में तेजी से फैली कि सब्जी मंडी भी बंद होने वाली है हालांकि कलेक्टर ने इस तरह के आदेश से इंकार किया और किसी भी तरह की अफवाह से बचने की सलाह दी बावजूद इसके शहर को थोक सब्जी मंडी लक्ष्मीगंज मंडी में सेकड़ों की संख्या में भीड़ पहुँच गई। कोरोना के भय और भीड़ का व्यापारियों ने फायदा उठाया और सभी सब्जियों के दाम 10 प्रतिशत तक बढ़ा दिये। हालात ये हो गए हैं कि लॉक डाउन के डर से लोगों ने सब्जी से लेकर दूध और किराने जैसी आवश्यक चीजें स्टॉक करनी शुरू कर दी हैं।

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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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