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हिमाचल के 73 नगर निकायों में चेयरमैन-वाइस चेयरमैन का डायरेक्ट चुनाव होगा, चुनाव प्रणाली बदलने पर विचार

Written by:Ankita Chourdia
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हिमाचल प्रदेश सरकार नगर परिषद और नगर पंचायतों में चेयरमैन व वाइस चेयरमैन के सीधे चुनाव पर विचार कर रही है। प्रस्ताव पर सहमति बनी तो 18 मार्च से शुरू होने वाले बजट सत्र के दूसरे चरण में संशोधन विधेयक लाया जा सकता है। इससे 31 मई से पहले होने वाले 73 शहरी निकाय चुनावों की पूरी चुनावी प्रक्रिया बदल सकती है।
हिमाचल के 73 नगर निकायों में चेयरमैन-वाइस चेयरमैन का डायरेक्ट चुनाव होगा, चुनाव प्रणाली बदलने पर विचार

हिमाचल प्रदेश की शहरी राजनीति में बड़ा संस्थागत बदलाव संभव है। राज्य सरकार नगर परिषद और नगर पंचायतों में चेयरमैन तथा वाइस चेयरमैन के चुनाव का तरीका बदलने पर मंथन कर रही है, ताकि इन पदों का चयन पार्षदों के बजाय सीधे जनता करे। फिलहाल यह प्रक्रिया अप्रत्यक्ष है और चुने हुए पार्षद अपने बीच से दोनों पद तय करते हैं।

सरकारी स्तर पर इस प्रस्ताव को लेकर चर्चा आगे बढ़ी है और शहरी विकास विभाग को भी इस दिशा में संकेत दिए गए हैं। अगला अहम चरण कैबिनेट चर्चा का माना जा रहा है। यदि कैबिनेट सहमति देती है, तो 18 मार्च से शुरू हो रहे बजट सत्र के दूसरे चरण में संबंधित संशोधन विधेयक पेश किया जा सकता है। अंतिम निर्णय अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस संभावना को गंभीरता से देखा जा रहा है।

राज्य में 73 शहरी स्थानीय निकाय हैं। इनमें चुनाव 31 मई से पहले कराने की समयसीमा उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप तय है। ऐसे में अगर विधायी संशोधन समय पर पास होता है, तो इसी चुनाव चक्र में नई प्रणाली लागू होने की स्थिति बन सकती है।

मौजूदा मॉडल से प्रस्तावित मॉडल तक क्या बदलेगा

अभी की व्यवस्था में मतदाता पार्षद चुनते हैं। इसके बाद निकाय के भीतर पार्षदों के वोट से चेयरमैन और वाइस चेयरमैन चुने जाते हैं। प्रस्तावित प्रणाली लागू हुई तो मतदाता को सीधे तीन स्तर पर चयन करना पड़ सकता है—एक वोट पार्षद के लिए, दूसरा चेयरमैन के लिए और तीसरा वाइस चेयरमैन के लिए।

यह बदलाव केवल मतदान तकनीक का नहीं, राजनीतिक शक्ति-संतुलन का भी है। अभी चेयरमैन बनने के लिए पार्षदों के बीच बहुमत जुटाना अनिवार्य रहता है। इस चरण में अक्सर दलगत अनुशासन, क्रॉस वोटिंग, स्थानीय गुटबंदी और पोस्ट-पोल समीकरण प्रभाव डालते हैं। सीधे चुनाव की स्थिति में उम्मीदवारों का प्राथमिक अभियान पार्षदों के बजाय आम मतदाता की ओर शिफ्ट होगा।

यही कारण है कि राजनीतिक दल इस प्रस्ताव को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति के बड़े पुनर्गठन के रूप में देख रहे हैं। निकाय चुनाव में तब सिर्फ वार्ड-स्तर की जीत काफी नहीं होगी; चेयरमैन और वाइस चेयरमैन पदों के लिए अलग पहचान वाले उम्मीदवार भी उतारने पड़ेंगे।

सीधे जनादेश के फायदे और टकराव की आशंका

सीधे चुनाव के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क जनादेश की स्पष्टता है। यदि चेयरमैन और वाइस चेयरमैन सीधे चुने जाते हैं, तो उनकी वैधता और राजनीतिक आधार को अधिक प्रत्यक्ष माना जाएगा। स्थानीय शासन के फैसलों पर उनका नैतिक दावा भी मजबूत दिखेगा, क्योंकि वे पार्षद-समर्थन नहीं बल्कि जनमत से आए होंगे।

दूसरी तरफ विशेषज्ञों का एक वर्ग इस मॉडल में संभावित टकराव भी देखता है। यदि चेयरमैन एक दल से और निकाय में बहुमत पार्षद किसी दूसरे दल के हों, तो नीतिगत और प्रशासनिक खींचतान बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में प्रस्ताव पारित करने, कामों की प्राथमिकता तय करने और कार्यान्वयन की गति पर असर पड़ने का खतरा रहता है। यानी मॉडल अधिक लोकतांत्रिक दिख सकता है, पर उसके साथ समन्वय की चुनौती भी जुड़ी रहेगी।

हिमाचल में पहले भी हो चुका है प्रयोग

राज्य में यह विचार बिल्कुल नया नहीं है। वर्ष 2011-12 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में नगर निकायों में मेयर और डिप्टी मेयर के सीधे चुनाव कराए गए थे। शिमला नगर निगम में उस समय माकपा के संजय चौहान मेयर और टिकेंद्र सिंह पंवर डिप्टी मेयर चुने गए थे। उस परिणाम को भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए झटका माना गया था।

बाद में वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने यह व्यवस्था समाप्त कर दी और पुरानी अप्रत्यक्ष प्रणाली बहाल कर दी। अब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौर में फिर से डायरेक्ट इलेक्शन का विकल्प चर्चा में है। इसलिए यह प्रस्ताव सिर्फ तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि पहले लागू और फिर वापस ली गई व्यवस्था की वापसी की संभावना भी माना जा रहा है।

अभी तस्वीर साफ नहीं है, क्योंकि औपचारिक निर्णय कैबिनेट और फिर विधानसभा की प्रक्रिया से ही तय होगा। लेकिन यदि संशोधन विधेयक बजट सत्र में आता और पारित होता है, तो हिमाचल के निकाय चुनावों का ढांचा इस बार पारंपरिक मॉडल से अलग दिख सकता है। इसका असर उम्मीदवार चयन, प्रचार शैली, दलों के स्थानीय समीकरण और मतदान व्यवहार—चारों स्तर पर पड़ेगा।

यही वजह है कि 31 मई की निर्धारित समयसीमा से पहले आने वाले हफ्ते शहरी निकाय चुनावों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। सरकार का अंतिम रुख, विधायी मंजूरी और चुनाव आयोग की तैयारियां तय करेंगी कि हिमाचल में इस बार मतदाता सिर्फ पार्षद नहीं, स्थानीय निकाय का शीर्ष नेतृत्व भी सीधे चुनेगा या नहीं।

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