हिमाचल प्रदेश सरकार ने जंगल बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बड़ी पहल की है। इसके तहत सामुदायिक स्तर पर पौधारोपण और उसके संरक्षण का कार्य करने वाले संगठनों को प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। योजना के लिए 100 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है, जिसमें से इस वित्तीय वर्ष में 20 करोड़ रुपए जारी किए जाएंगे। यह धनराशि कैंपा फंड से उपलब्ध कराई जाएगी। पहले साल में 1500 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधारोपण का लक्ष्य रखा गया है। सरकार ने साफ किया है कि प्रोत्साहन राशि केवल पौधों की सर्वाइवल रेट के आधार पर दी जाएगी। योजना का नाम राजीव गांधी वन संवर्धन योजना रखा गया है और इसे वन विभाग ने अधिसूचित कर दिया है।
जंगल बढ़ाने को 100 करोड़ की योजना
योजना के तहत सामुदायिक संगठनों को पौधारोपण शुरू करने के लिए पहले 50 प्रतिशत राशि मिलेगी। शेष राशि पौधे लगाने के बाद वन विभाग की वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी होने पर दी जाएगी। पौधारोपण के लिए स्थल चयन भी संरचित तरीके से किया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) अपने क्षेत्र में बंजर और क्षतिग्रस्त वन भूमि की सूची तैयार कर प्रस्तुत करेंगे। प्रगति और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जियोटेगिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग की व्यवस्था होगी। वहीं, सर्वाइवल रेट की जांच फॉरेस्ट गार्ड, रेंज ऑफिसर और डीएफओ करेंगे और फोटोग्राफिक साक्ष्य भी सुरक्षित रखे जाएंगे।
सरकार ने सर्वाइवल रेट के आधार पर इंसेंटिव तय किए हैं। यदि पहले साल में 50% से अधिक पौधे जीवित रहते हैं तो सामुदायिक समूह को प्रति दो हेक्टेयर पर 1 लाख रुपए मिलेंगे। 45-50% सर्वाइवल पर 80 हजार और 35-45% पर 60 हजार रुपए दिए जाएंगे। यही प्रावधान दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें साल तक लागू रहेगा। चौथे और पांचवें साल में 50% से ज्यादा सर्वाइवल पर 1 लाख रुपए, 45-50% पर 90 हजार और 35-45% पर 80 हजार रुपए देने का प्रावधान है। इस तरह लगातार पांच साल तक पौधों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।
योजना में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सख्त नियम भी बनाए गए हैं। यदि प्लांट वेरिफिकेशन में किसी तरह की खामी या फंड के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो संबंधित सामुदायिक समूह पर कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए कंजरवेटर और डीएफओ को अधिकार दिए गए हैं। वहीं, किसी स्थल पर किसी भी सामुदायिक समूह का मालिकाना हक नहीं होगा। विवादों के निपटारे के लिए डीएफओ स्तर पर विशेष तंत्र बनाया गया है। सरकार को उम्मीद है कि इस योजना से न केवल जंगल बढ़ेंगे बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा।





