हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 5 बीघा तक सरकारी जमीन पर अवैध कब्जों के नियमितीकरण संबंधी नीति को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। यह नीति वर्ष 2002 में तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा लागू की गई थी, जिसमें सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों से आवेदन लेकर कब्जों को नियमित किया जा रहा था। इस नीति के तहत करीब 1 लाख 67 हजार लोगों ने आवेदन किए थे, लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले से इन सभी आवेदकों को बड़ा झटका लगा है।
हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई करते हुए 44 पेज का विस्तृत निर्णय सुनाया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2002 में भूमि राजस्व अधिनियम में जोड़ी गई धारा 163-A और इसके तहत बनाए गए सभी नियम पूरी तरह मनमाने और संविधान के खिलाफ हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने 28 फरवरी 2026 तक सभी अवैध कब्जों को हटाने के स्पष्ट आदेश राज्य सरकार को दिए हैं।
कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा की तरह हिमाचल प्रदेश को भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को “क्रिमिनल ट्रेसपास” के तहत दंडनीय अपराध घोषित करना चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए और यह कार्य तय समयसीमा के भीतर हर हाल में पूरा किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस याचिका के कारण यदि किसी को अतिक्रमण हटाने से किसी प्रकार की राहत या सुरक्षा मिली है, तो अब वह भी समाप्त मानी जाएगी।
उल्लेखनीय है कि 1983 में सरकार ने पहली बार ₹50 प्रति बीघा शुल्क लेकर 5 बीघा तक के कब्जे नियमित करने की अनुमति दी थी। बाद में 10 से 20 बीघा तक के कब्जों पर भारी जुर्माने और 20 बीघा से अधिक पर सीधे बेदखली का प्रावधान था। इन नीतियों में कई बार संशोधन भी किया गया, लेकिन अब हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ये सभी नीतियां कानून के शासन के खिलाफ हैं। इससे हजारों कब्जाधारकों की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है।





