हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने निचली अदालत की ओर से जारी किए गए गैर-जमानती वारंटों को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की जमानत बहाल कर दी है। यह आदेश 6 अगस्त और 5 नवंबर 2024 को निचली अदालत द्वारा जारी वारंटों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया। अदालत ने न केवल रद्द की गई जमानत को पुनर्जीवित किया बल्कि पहले से जमा किए गए जमानती मुचलकों को भी बहाल करने का निर्देश दिया। न्यायाधीश विजेंद्र सिंह की खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत का आदेश कानून के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करना अदालतों का कर्तव्य है।

हाईकोर्ट ने रद्द किए गैर-जमानती वारंट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता का मौजूदा जमानतदार अब उसकी जमानत नहीं लेना चाहता है, तो याचिकाकर्ता को सात दिनों के भीतर निचली अदालत में नए जमानती मुचलके प्रस्तुत करने होंगे। अदालत ने कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ सीधे गैर-जमानती वारंट तभी जारी किए जा सकते हैं, जब यह साबित हो जाए कि उसकी उपस्थिति जमानती वारंट से सुनिश्चित नहीं हो सकती। अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसे वारंट मनमाने ढंग से जारी नहीं किए जाने चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि वारंट जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट को मामले की गंभीरता, आरोपी का पूर्व आचरण और फरार होने की संभावना जैसे पहलुओं पर विचार करना चाहिए।

मामला दरअसल भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के खिलाफ 31 मार्च 2022 को एफआईआर दर्ज हुई थी और बाद में 15 जून 2022 को उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने निचली अदालत में चार्जशीट दाखिल की। इस बीच, 6 अगस्त 2024 को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अपने वकील को पेश न होने के लिए आवेदन देने का निर्देश दिया था, लेकिन वकील न तो अदालत में हाजिर हुए और न ही कोई आवेदन दाखिल किया। इसी आधार पर शिमला की ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अदालत ने उनके निजी और जमानती मुचलकों को रद्द कर दिया और सीधे गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए।

हाईकोर्ट ने इस पूरे प्रकरण की समीक्षा करने के बाद निचली अदालत के आदेश को गलत ठहराया और स्पष्ट किया कि वारंट जारी करना आखिरी विकल्प होना चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय संविधान का मूल है और न्यायालयों की जिम्मेदारी है कि वे उसे सुरक्षित रखें। आदेश में कहा गया कि भविष्य में अदालतों को ऐसे मामलों में उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा और आरोपी की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से प्रभावित करने वाले आदेशों से बचना चाहिए।