
नई दिल्ली, डेस्क रिपोर्ट। हमारा देश विविधताओं से भरा है। यहां कई तरह की संस्कृतियां और परंपराएं हैं और सबका अपना महत्व है। ऐसे ही कई उत्सव हैं जो हर जगह मनाए जाते हैं और कई ऐसे जो किसी राज्य विशेष में। ऐसा ही एक उत्सव है हरेला, जो खासतौर पर उत्तराखंड में मनाया जाता है। आज ये पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है।
प्रकृति और मनुष्य को जोड़ने वाला लोकपर्व है हरेला। इसमें घर के मंदिर में कई तरह के अनाज को टोकरी में बोया जाता है और फिर बाद में उसे काटते हैं। हरेला का शाब्दिक अर्थ अंकुरित अनाज है, इसका तात्पर्य उस अनाज से है जो टोकरी में उगता है। यूं तो ये पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है। चैत्र माह में प्रथम दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है। सावन माह लगने से नौ दिन पहले बोया जाता है और दस दिन बाद सावन के पहले दिन काटा जाता है तथा अश्विन माह में नवरात्रि के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे पर काटा जाता है। लेकिन इनमें भी सावन में आने वाले हरेला का सामाजिक रूप से विशेष महत्व है। ये कुमाऊं क्षेत्र में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। हरेला पर्व के साथ ही सावन का महीना शुरू होता है और मान्यता है कि अगर टोकरी में भरकर अनाज उगा है तो इस बार फसल अच्छी होगी। टोकरी में लगे अनाज को काटने से पहले देवी देवताओं को पकवानों का भोग लगाया जाता है। सावन माह शिवशंकर को समर्पित है और हरेला पर्व को कहीं कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। ये पर्व प्रकृति और मनुष्य के तादात्म्य का उत्सव है और इस दौरान लोग प्रकृति और ईश्वर के प्रति आभार जताते हैं।
हरेला पर्व कल मनाया जाएगा। इसे लेकर घर-घर में उत्साह का माहौल है और लोकगीत गाये जा रहे हैं। सावन आरंभ होने से कुछ दिन पहले हरेला बोया जाता है, जिसे संक्रांति के दिन काटा जाता है। आप सभी के लिए प्रकृति से जुड़ा यह लोकपर्व मंगलमय हो।
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— Uttarakhand Tourism (@UTDBofficial) July 15, 2022
पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

