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Sun, Jan 11, 2026

एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन, बिना चावल कैसे मनाएं खिचड़ी पर्व?

Written by:Bhawna Choubey
Published:
Last Updated:
14 जनवरी को मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है। एक ओर खिचड़ी पर्व, दूसरी ओर एकादशी का व्रत ऐसे में चावल खाना धर्मसम्मत है या नहीं?
एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन, बिना चावल कैसे मनाएं खिचड़ी पर्व?

मकर संक्रांति आते ही घरों में तिल-गुड़ की खुशबू, दान-पुण्य की तैयारी और खिचड़ी का स्वाद याद आने लगता है। यह पर्व सूर्य देव को समर्पित माना जाता है और साल के सबसे शुभ त्योहारों में गिना जाता है। लेकिन इस बार मकर संक्रांति को लेकर लोगों के मन में असमंजस है। वजह है एक ही दिन एकादशी तिथि का पड़ना। एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना जाता है, जबकि मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है और खिचड़ी में चावल जरूरी होता है। ऐसे में आम लोगों के मन में सवाल है कि बिना चावल खाए मकर संक्रांति कैसे मनाई जाए? क्या खिचड़ी खाना पाप होगा या व्रत टूट जाएगा? हम धर्म-शास्त्रों और विद्वानों की मान्यताओं के आधार पर इसका साफ और सरल जवाब दे रहे हैं।

मकर संक्रांति 2026 और षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग

14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति मनाई जाएगी। इसी दिन माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है, जिसे षटतिला एकादशी कहा जाता है। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 13 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 14 जनवरी की शाम 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। धर्म-शास्त्रों के अनुसार षटतिला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन तिल से जुड़े छह कार्य तिल का दान, तिल का सेवन, तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन और तिल का भोग बहुत शुभ माने जाते हैं। संयोग से मकर संक्रांति पर भी तिल और गुड़ खाने-दान करने की परंपरा है। इसी कारण यह दिन और भी खास हो जाता है।

खिचड़ी पर्व का धार्मिक महत्व क्या है

मकर संक्रांति को कई राज्यों में खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है। खासकर उत्तर भारत में इस दिन चावल, उड़द की दाल, घी और सब्जियों से बनी खिचड़ी बनाई जाती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने और दान करने से सूर्य देव और शनि देव दोनों प्रसन्न होते हैं। धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन गर्म, सात्विक और साधारण भोजन करना शुभ होता है। खिचड़ी को ऐसा भोजन माना गया है जो शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है। यही वजह है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी का विशेष महत्व है और लोग इसे बड़े श्रद्धा भाव से ग्रहण करते हैं।

एकादशी पर चावल क्यों वर्जित माने जाते हैं

एकादशी व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल खाने से दोष लगता है। मान्यता है कि एकादशी पर चावल खाने से पाप लगता है और व्रत का फल नहीं मिलता। इसी कारण जो लोग एकादशी का नियम पूरी श्रद्धा से मानते हैं, वे चावल, उड़द और उससे बने व्यंजन नहीं खाते। ऐसे में मकर संक्रांति और एकादशी का एक ही दिन होना लोगों को असमंजस में डाल रहा है।

धर्म-शास्त्रों के अनुसार पहला विकल्प: पर्व बड़ा, नियम लचीला

धर्म-शास्त्रों के जानकारों के अनुसार साल में एक बार आने वाले बड़े पर्वों पर कुछ नियमों में शिथिलता स्वीकार की जाती है। मकर संक्रांति को सूर्य पर्व माना गया है और इसका महत्व बहुत बड़ा है। विद्वानों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति मकर संक्रांति को पूरे विधि-विधान से मनाना चाहता है, तो खिचड़ी का सेवन किया जा सकता है। ऐसे में यह एकादशी व्रत का दोष नहीं माना जाएगा, क्योंकि यहां पर्व की प्रधानता मानी जाती है। हालांकि यह निर्णय व्यक्ति की श्रद्धा और आस्था पर निर्भर करता है।

एकादशी समाप्त होने के बाद खिचड़ी का सेवन

जो लोग एकादशी के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं, उनके लिए धर्म-शास्त्रों में दूसरा स्पष्ट विकल्प भी बताया गया है। ऐसे लोग 14 जनवरी को शाम 5 बजकर 52 मिनट के बाद खिचड़ी का दान और सेवन कर सकते हैं। क्योंकि इस समय के बाद एकादशी तिथि समाप्त हो जाएगी और द्वादशी शुरू हो जाएगी। ऐसे में चावल खाने पर कोई दोष नहीं लगेगा। इस उपाय को ज्योतिषाचार्य सबसे सुरक्षित और संतुलित मानते हैं।

खिचड़ी दान से मिलेगा कई गुना फल

धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि मकर संक्रांति और एकादशी के संयोग में किया गया दान अत्यंत फलदायी होता है। इस दिन खिचड़ी, तिल, गुड़, कपड़े और अन्न का दान करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति स्वयं खिचड़ी नहीं खा पा रहा है, तो कम से कम खिचड़ी का दान जरूर करना चाहिए। इससे पर्व का पुण्य भी मिलेगा और नियमों का उल्लंघन भी नहीं होगा।

23 साल पहले भी बना था ऐसा ही संयोग

धर्माचार्यों के अनुसार साल 2003 में भी मकर संक्रांति के दिन एकादशी तिथि पड़ी थी। उस समय भी लोगों के बीच यही सवाल उठा था। तब भी शास्त्रों ने यही मार्ग बताया था कि या तो एकादशी समाप्त होने के बाद खिचड़ी खाएं या फिर दान को प्राथमिकता दें। इसके बाद अगली बार यह दुर्लभ संयोग सीधे 2026 में बना है। इस वजह से इस साल मकर संक्रांति का महत्व और भी बढ़ जाता है।

Disclaimer- यहां दी गई सूचना सामान्य जानकारी के आधार पर बताई गई है। इनके सत्य और सटीक होने का दावा MP Breaking News नहीं करता।