मध्य प्रदेश में गिद्धों की घटती आबादी पर नजर रखने और उनके संरक्षण के प्रयासों को तेज करने के लिए वन विभाग ने अपना तीन दिवसीय शीतकालीन गणना अभियान शुरू कर दिया है। इंदौर वनमंडल में 20 फरवरी को शुरू हुए इस अभियान के पहले दिन टीमों को 97 गिद्ध नजर आए। यह गणना 22 फरवरी तक चलेगी।
दिलचस्प बात यह है कि पहले दिन गिने गए सभी गिद्ध इजिप्शियन वल्चर (Egyptian Vulture) प्रजाति के थे। खराब मौसम और कुछ इलाकों में हुई बारिश के बावजूद वन विभाग की टीमों ने सुबह-सुबह अपनी गणना पूरी की। विभाग को उम्मीद है कि अगले दो दिनों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
चोरल रेंज बना गिद्धों का हॉटस्पॉट
पहले दिन के आंकड़ों के अनुसार, गिद्धों का सबसे बड़ा ठिकाना चोरल फॉरेस्ट रेंज रहा। यहां अकेले 89 गिद्ध दर्ज किए गए, जो कुल संख्या का 90% से भी अधिक है।
वनमंडल के अन्य रेंजों में इनकी संख्या काफी कम रही। रेंज-वार आंकड़े इस प्रकार हैं:
- चोरल रेंज: 89 गिद्ध
- इंदौर रेंज: 4 गिद्ध
- महू रेंज: 2 गिद्ध
- मानपुर रेंज: 2 गिद्ध
यह आंकड़े दिखाते हैं कि संरक्षण के लिए चोरल रेंज का महत्व कितना अधिक है।
कैसे होती है यह विशेष गणना?
वन विभाग के नियमों के अनुसार, इस सर्वेक्षण में केवल बैठे हुए गिद्धों की ही गिनती की जाती है, उड़ते हुए गिद्धों को इसमें शामिल नहीं किया जाता। इंदौर वनमंडल में 16 टीमों ने 38 चिन्हित स्थानों पर यह सर्वे किया। इनमें तिंछा फाल, देवगुराड़िया ट्रेंचिंग ग्राउंड, पेडमी और पातालपानी जैसे इलाके शामिल हैं, जहां गिद्धों के मिलने की संभावना अधिक होती है।
यह सर्वे सुबह 6 बजे से 8 बजे के बीच किया गया। इस बार डेटा को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाने के लिए पहली बार कुछ क्षेत्रों में Epicollect5 जैसे मोबाइल ऐप का भी उपयोग किया जा रहा है।
संरक्षण की चुनौती और पिछले आंकड़े
गिद्धों को ‘प्रकृति का सफाईकर्मी’ कहा जाता है क्योंकि वे मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है, जिसका एक बड़ा कारण पशुओं को दी जाने वाली डाइक्लोफेनाक जैसी दवाएं रही हैं।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले वर्षों में संख्या में उतार-चढ़ाव देखा गया है। साल 2021 में 117 और 2023 में 114 गिद्ध दर्ज किए गए थे, जबकि पिछली गणना में यह संख्या घटकर 86 रह गई थी। इसी गिरावट को देखते हुए अब साल में दो बार (फरवरी और अप्रैल) गणना की जा रही है ताकि संरक्षण की बेहतर रणनीति बनाई जा सके।






