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मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर को दी मंजूरी, 2360 करोड़ की लागत से 17 गांवों के किसानों की बदलेगी किस्मत

Written by:Banshika Sharma
Published:
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम (एमपीआईडीसी) ने 2360 करोड़ रुपये के इंदौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर को मंजूरी दे दी है। यह 21 किलोमीटर लंबा आठ लेन का कॉरिडोर देश की पहली ऐसी परियोजना होगी, जहां किसानों की सहभागिता और लैंड पूलिंग के तहत 60% विकसित भूमि लौटाकर एक नया औद्योगिक भविष्य तैयार किया जाएगा।
मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर को दी मंजूरी, 2360 करोड़ की लागत से 17 गांवों के किसानों की बदलेगी किस्मत

मध्य प्रदेश की औद्योगिक तस्वीर को बदलने वाली एक महत्वाकांक्षी परियोजना को मंगलवार को हरी झंडी मिल गई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम (एमपीआईडीसी) के संचालक मंडल की बैठक में इंदौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर के निर्माण को मंजूरी दे दी गई है। करीब 2360 करोड़ रुपये की लागत वाली यह परियोजना सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक हब पीथमपुर और व्यावसायिक राजधानी इंदौर के बीच विकास का एक नया अध्याय लिखेगी।

यह 21 किलोमीटर लंबा और आठ लेन चौड़ा कॉरिडोर इंदौर से शुरू होकर सीधे पीथमपुर के एबी रोड से जुड़ेगा। इसका मुख्य उद्देश्य इंदौर एयरपोर्ट, शहर और पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के बीच कनेक्टिविटी को विश्वस्तरीय बनाना है, जिससे लॉजिस्टिक्स और परिवहन में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा।

देश का पहला मॉडल: जमीन के मालिक किसान ही रहेंगे

इस परियोजना की सबसे खास बात इसका लैंड पूलिंग मॉडल है, जो इसे देश में अनूठा बनाता है। इसके तहत कॉरिडोर के दोनों ओर 3 से 5 किलोमीटर के दायरे में एक विशाल औद्योगिक जोन विकसित किया जाएगा। कुल 1290.74 हेक्टेयर (लगभग 3200 एकड़) भूमि का विकास प्रस्तावित है, लेकिन सरकार किसानों से जमीन का अधिग्रहण नहीं करेगी।

इसके बजाय, किसानों की सहमति से उनकी जमीन लेकर उसे विकसित किया जाएगा और कुल विकसित भूमि का 60 प्रतिशत हिस्सा किसानों को वापस लौटा दिया जाएगा। यह सामान्य लैंड पूलिंग एक्ट के 50 प्रतिशत के प्रावधान से कहीं ज्यादा है, जिसे मुख्यमंत्री के विशेष निर्देश पर बढ़ाया गया है। किसान इस विकसित जमीन पर या तो खुद उद्योग लगा सकेंगे या इसे किसी अन्य उद्योगपति को बेच या लीज पर दे सकेंगे। जो किसान इस योजना में शामिल नहीं होना चाहते, वे राज्य की भूमि क्रय नीति के तहत नकद मुआवजा ले सकते हैं।

इन 17 गांवों का होगा कायाकल्प

इस विशाल परियोजना से इंदौर और धार जिले के 17 गांवों के किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। इनमें कोडियाबर्डी, नैनोद, रिंजलाय, बिसनावदा, नावदा पंथ, श्रीराम तलावली, सिन्दोड़ा, सिन्दोड़ी, शिवखेड़ा, नरलाय, मोकलाय, डेहरी, सोनवाय, भैंसलाय, बागोदा, टीही और धन्नड़ शामिल हैं। इस विकास से न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि रोजगार के हजारों नए अवसर भी पैदा होंगे।

उद्योगों के साथ बसेगा नया शहर

यह कॉरिडोर सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। यहां एक सुनियोजित शहरी क्षेत्र विकसित करने की भी योजना है। उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए हाउसिंग स्कीम्स लाई जाएंगी। किसान और बिल्डर मिलकर कॉलोनियां विकसित कर सकेंगे, जिनमें शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मॉल, दुकानें और ऑफिस एरिया भी शामिल होंगे। इससे यह क्षेत्र एक आत्मनिर्भर आर्थिक जोन के रूप में उभरेगा।

चुनौतियों के बीच परियोजना ने पकड़ी रफ्तार

हालांकि, शुरुआती दौर में कुछ किसानों ने इस योजना पर आपत्तियां जताई थीं और करीब 450 अपीलें भोपाल में लंबित हैं, जिन पर सुनवाई चल रही है। लेकिन अधिकारियों के अनुसार, लैंड पूलिंग प्रक्रिया में अच्छी प्रगति हुई है। कई सौ हेक्टेयर भूमि के लिए किसानों की सहमति मिल चुकी है और रजिस्ट्री का काम भी शुरू हो गया है। एमपीआईडीसी इस परियोजना को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर विकसित कर रहा है, ताकि इसका निर्माण तेजी से पूरा हो सके। यह कॉरिडोर मध्य भारत के औद्योगिक विकास को नई रफ्तार देने का दम रखता है।

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