जंगलों और खुले मैदानों में कभी बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले गिद्ध अब धीरे-धीरे नजरों से गायब होते जा रहे हैं। गांवों और शहरों के आसपास जहां पहले आसमान में गिद्धों के झुंड दिखाई देते थे, अब वहां सन्नाटा दिखता है। यही वजह है कि वन विभाग अब इस संकट को गंभीरता से लेने लगा है।
मध्य प्रदेश में गिद्धों की घटती संख्या को देखते हुए अब राज्य स्तर पर विशेष अभियान शुरू किया जा रहा है। सरकार और वन विभाग ने फैसला किया है कि गिद्धों की वास्तविक संख्या जानने के लिए हर साल दो बार गिनती की जाएगी, ताकि संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
इंदौर वनमंडल से शुरू हुई तैयारी
इस अभियान की तैयारी पिछले दिनों इंदौर वनमंडल में शुरू की गई। यहां वनकर्मियों को गिद्धों की पहचान, गिनती के तरीके और सर्वे के नियमों की ट्रेनिंग दी गई। अधिकारियों का कहना है कि सही आंकड़ा मिलना बहुत जरूरी है, क्योंकि उसी के आधार पर भविष्य की योजनाएं बनाई जाएंगी।
इंदौर वनमंडल के अंतर्गत आने वाले महू, चोरल और मानपुर रेंज के कर्मचारियों को भी प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें बताया गया कि किस समय गिद्ध आसानी से दिखाई देते हैं, किस तरह फोटो रिकॉर्ड रखना है और किस तरह एक ही गिद्ध की दो बार गिनती होने से बचना है। वन विभाग का मानना है कि यदि गिनती वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो गिद्ध संरक्षण के प्रयास ज्यादा सफल हो सकते हैं।
तीन दिन चलेगा गिद्धों की गिनती का विशेष अभियान
अधिकारियों के अनुसार 20 फरवरी से तीन दिन तक यह विशेष अभियान चलेगा। सुबह 6 से 8 बजे के बीच टीमें अलग-अलग स्थानों पर पहुंचेंगी। यही समय गिनती के लिए सबसे बेहतर माना जाता है, क्योंकि उस समय गिद्ध खुले स्थानों या पेड़ों पर बैठे मिलते हैं।
टीम के सदस्य खाली मैदानों, चट्टानों और पेड़ों पर बैठे गिद्धों की गिनती करेंगे। साथ ही उनकी फोटोग्राफी भी की जाएगी ताकि रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जा सके। यह डेटा भविष्य में तुलना करने और स्थिति समझने में मदद करेगा। वन विभाग के अनुसार गिद्धों की गिनती का यह अभियान अब नियमित प्रक्रिया बन चुका है और हर बार इसके आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं।
तिंछा फाल, देवगुराड़िया और कई अहम जगहों पर पहुंचेगी टीम
इस बार गिनती के लिए 38 स्थानों को चिन्हित किया गया है, जहां गिद्धों की मौजूदगी पहले दर्ज की जा चुकी है। इनमें प्रमुख स्थानों में तिंछा फाल, देवगुराड़िया, पेडमी, कजलीगढ़, रतवी, कंपेल, गिद्ध खोह और पातालपानी जैसे इलाके शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में चट्टानी ढलान, जंगल और खुले क्षेत्र मौजूद हैं, जहां गिद्ध अक्सर बैठते और भोजन की तलाश करते देखे जाते हैं। करीब 40 से ज्यादा वनकर्मी इस अभियान में शामिल होंगे।
रेंजर संगीता ठाकुर के अनुसार, हर टीम को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि गिनती के साथ-साथ फोटो और प्रमाण भी सुरक्षित रखें ताकि भविष्य में डेटा का सही उपयोग किया जा सके।
आखिर क्यों घट रही है गिद्धों की संख्या?
विशेषज्ञों के अनुसार गिद्धों की घटती संख्या के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाइयों का असर माना जाता है। जब ये दवाइयां पशुओं के शरीर में रहती हैं और गिद्ध उस मृत पशु को खाते हैं, तो यह उनके लिए घातक साबित होती हैं।
इसके अलावा जंगलों का कम होना, भोजन की कमी, और इंसानी गतिविधियों का बढ़ना भी गिद्धों के लिए खतरा बन रहा है। कई जगह खुले मैदान और प्राकृतिक आवास खत्म होते जा रहे हैं, जिससे इनके रहने की जगह कम हो रही है।
गिद्ध पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी पक्षी हैं क्योंकि वे मृत जानवरों को खाकर वातावरण को साफ रखने में मदद करते हैं। इनके कम होने से सड़ते शवों से बीमारी फैलने का खतरा बढ़ सकता है।
पिछले आंकड़े बताते हैं खतरे की गंभीरता
वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार स्थिति काफी चिंताजनक है। साल 2016 में इंदौर वनमंडल में 284 गिद्ध दर्ज किए गए थे, लेकिन 2019 में यह संख्या घटकर 97 रह गई। इसके बाद 2021 में 117 और 2023 में 114 गिद्ध दर्ज किए गए।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा 2025 का रहा, जब यहां केवल 86 गिद्ध पाए गए। यह गिरावट साफ बताती है कि अगर अभी ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में गिद्धों को बचाना और कठिन हो सकता है।
इजिप्शियन गिद्ध सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं
प्रदेश में कई प्रजातियों के गिद्ध पाए जाते हैं, जिनमें इजिप्शियन, वाइट रम्प्ड, किंग वल्चर, लांग बिल्ड और यूरेशियन गिद्ध शामिल हैं। इंदौर क्षेत्र में सबसे ज्यादा इजिप्शियन गिद्ध देखे जाते हैं। इनकी पहचान सफेद शरीर, पीली चोंच और पतली गर्दन से की जाती है। ये अक्सर खुले इलाकों में या पहाड़ी चट्टानों के पास दिखाई देते हैं।





