पहचान के अभाव में गंभीर रूप से घायल एक मजदूर का इलाज जबलपुर में रुकने की कगार पर था, लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड और बायोमेट्रिक तकनीक ने उसे नई जिंदगी दी। दरअसल सिहोरा निवासी अजय मेहरा पिछले पंद्रह दिनों से कटंगी बायपास के एक निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। एक भीषण ऑटो दुर्घटना में उन्हें गंभीर चोटें आई थीं, और उनका शरीर कई जगह से फ्रैक्चर हो गया था। अस्पताल में भर्ती होने के बाद शुरुआती इलाज तो चला, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, पहचान के पुख्ता दस्तावेजों की कमी उनके आगे के उपचार में बड़ी बाधा बन गई। बिना किसी वैध पहचान पत्र के, अस्पताल प्रशासन के लिए उनका इलाज जारी रखना मुश्किल हो रहा था, जिससे उनके ठीक होने की उम्मीदें धूमिल होती जा रही थीं।
दरअसल अजय के पास न तो अपना आधार कार्ड था और न ही कोई अन्य सरकारी दस्तावेज, जिससे उनकी पहचान स्थापित की जा सके। ऐसे में 13 साल पुराने डिजिटल डेटाबेस से उनके रिकॉर्ड को खोजना लगभग असंभव सा प्रतीत हो रहा था। यह स्थिति न केवल अजय के लिए बल्कि उनके पड़ोसियों के लिए भी चिंता का विषय बन गई थी, जो उनकी मदद के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे थे।
जानिए पूरा मामला?
दरअसल शनिवार की शाम लगभग चार बजे, अजय के पड़ोसी उन्हें एक एम्बुलेंस से लेकर जबलपुर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। दफ्तर बंद होने की तैयारी थी और कर्मचारी अपने घरों की ओर लौटने की जल्दबाजी में थे, लेकिन अजय की गंभीर स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने इसे एक सामान्य कार्य न मानकर एक महत्वपूर्ण मिशन के रूप में लिया। मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए, कलेक्टर कार्यालय में मौजूद अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई करने का निर्णय लिया। आधार केंद्र की दोनों टीमों को, जो छुट्टी पर थीं, तुरंत बुलाया गया और उन्होंने बिना किसी देरी के मोर्चा संभाल लिया।
ऐसे जारी हुआ नया आधार कार्ड
प्रशासन की यह तत्परता और आधार टीमों का समर्पण ही था जिसने अजय की जान बचाने की उम्मीद जगाई। महज दो घंटे की कड़ी मशक्कत और अथक प्रयासों के बाद, शाम करीब छह बजे तक उनका पुराना रिकॉर्ड खोज लिया गया और एक नया आधार कार्ड भी जारी कर दिया गया। यह त्वरित कार्रवाई किसी चमत्कार से कम नहीं थी, जिसने अजय का रुका हुआ इलाज तत्काल जारी रखने का मार्ग प्रशस्त किया। अस्पताल को जैसे ही नया आधार कार्ड मिला, उन्होंने तुरंत उपचार प्रक्रिया फिर से शुरू कर दी, जिससे अजय को जीवनदान मिला।
बायोमेट्रिक मिलान रहा निर्णायक पहलू
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक पहलू ‘बायोमेट्रिक मिलान’ रहा, जिसने मरीज की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई। जबलपुर के डीजीसीएम चित्रांशु त्रिपाठी ने इस मामले की जानकारी देते हुए बताया कि अजय का आधार कार्ड वर्ष 2013 में बना था, लेकिन दुर्घटना के कारण या शायद समय बीत जाने के कारण उन्हें अपने पुराने आधार विवरण याद नहीं थे। यह एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि बिना किसी जानकारी के इतने पुराने रिकॉर्ड को खोजना घास के ढेर में सुई खोजने जैसा था।
आधार टीम ने सर्वर पर मौजूद विशाल डिजिटल डेटाबेस में अजय की पहचान खोजना शुरू किया। यह कार्य किसी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि अजय को स्वयं अपने पुराने विवरण याद नहीं थे। ऐसे में टीम ने सिहोरा क्षेत्र से जुड़े संभावित पिन कोड की एक लंबी सूची तैयार की। इसके साथ ही, विभिन्न संभावित पतों और अनुमानित जन्म वर्षों का संयोजन करके बायोमेट्रिक्स, यानी उनके उंगलियों के निशान और आंखों की पुतली का डेटाबेस में मिलान करने का अथक प्रयास किया गया। एक-एक करके सैकड़ों प्रविष्टियों को खंगाला गया, हर संभावित कोण से जांच की गई, ताकि 13 साल पहले दर्ज किए गए उस रिकॉर्ड तक पहुंचा जा सके। आखिरकार, कई घंटों की गहन खोजबीन के बाद, टीम को वर्ष 1983 के जन्म वर्ष और बायोमेट्रिक डेटा का सिस्टम से सफलतापूर्वक मिलान करने में सफलता मिली और उनका पुराना रिकॉर्ड सामने आ गया। इस असाधारण प्रयास ने न केवल अजय को उनकी पहचान वापस दिलाई, बल्कि उन्हें जीवन का एक और मौका भी प्रदान किया। यह घटना डिजिटल इंडिया की शक्ति और प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।






