मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी धार्मिक संस्था या दारुल इफ्ता द्वारा जारी फतवे के आधार पर फैमिली कोर्ट से तलाक की घोषणा की डिक्री नहीं ली जा सकती। कोर्ट ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए पति की सिविल याचिका खारिज कर दी।
यह मामला भोपाल निवासी डॉ. शाजिया नवाज खान और सैयद सामी अली से जुड़ा है। दोनों करीब दो साल से अलग रह रहे हैं। पति ने भोपाल की दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी से तलाक पर राय मांगी थी। कमेटी की ओर से जारी फतवे के आधार पर उन्होंने फैमिली कोर्ट में तलाक की घोषणा की डिक्री की मांग की थी।
फतवा केवल धार्मिक मार्गदर्शन है
पत्नी ने फैमिली कोर्ट में इस याचिका को खारिज करने की मांग की, लेकिन आवेदन खारिज होने पर उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने कहा कि दारुल इफ्ता या कोई भी धार्मिक संस्था किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक देने का अधिकार नहीं रखती। फतवा केवल धार्मिक मार्गदर्शन है, इसे कानूनी आदेश या तलाक का फैसला नहीं माना जा सकता।
अदालत ने बताई क़ानूनी प्रक्रिया
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम पुरुष भी फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 के तहत सीधे फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर सकते हैं। अदालत ने माना कि पति ने कानूनी प्रक्रिया अपनाने के बजाय फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा की मांग की, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।






