झाबुआ की फिजाओं में आज से रंग, संगीत और उल्लास घुलने लगा है। सालभर जिसका इंतजार रहता है, वह बहुप्रतीक्षित भगोरिया फेस्टिवल 24 फरवरी से शुरू हो गया है। जनजातीय अंचल में यह सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि पहचान, परंपरा और प्रेम का उत्सव है। गांव-गांव में तैयारियां कई दिनों से चल रही थीं और अब पूरे जिले में सात दिनों तक उत्साह की लहर दौड़ेगी।
24 फरवरी से लेकर 2 मार्च तक चलने वाला यह लोकपर्व झाबुआ जिले के लिए खास महत्व रखता है। होली से पहले मनाया जाने वाला भगोरिया फेस्टिवल जनजातीय संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करता है। दूर-दराज शहरों में काम करने गए लोग भी इन दिनों अपने गांव लौट आते हैं ताकि वे इस ऐतिहासिक उत्सव का हिस्सा बन सकें।
झाबुआ में 35 भगोरिया मेले, हर दिन अलग रंग
इस वर्ष झाबुआ जिले में कुल 35 भगोरिया मेले आयोजित किए जा रहे हैं। हर दिन अलग-अलग स्थानों पर मेले लगेंगे, जहां हजारों लोग जुटेंगे। इन मेलों में झूले, चकरी, खिलौनों की दुकानें और स्वादिष्ट स्थानीय व्यंजन आकर्षण का केंद्र रहेंगे।
भगोरिया फेस्टिवल की सबसे खास बात यह है कि इसमें शत प्रतिशत जनजातीय सहभागिता होती है। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा पहनकर, चांदी के आभूषणों से सजे हुए, ढोल और मांदल की थाप पर नाचते-गाते नजर आते हैं। हर गांव में एक अलग ऊर्जा दिखाई देती है। भगोरिया फेस्टिवल झाबुआ की सांस्कृतिक पहचान है। यह मेला सिर्फ खरीद-फरोख्त का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल का बड़ा मंच है।
ढोल-मांदल की थाप पर झूमेगा जनजातीय समाज
भगोरिया फेस्टिवल के दौरान जैसे ही ढोल और मांदल की आवाज गूंजती है, पूरा वातावरण उत्साह से भर जाता है। युवा पारंपरिक नृत्य करते हैं, बुजुर्ग लोकगीत गाते हैं और बच्चे रंग-बिरंगी पिचकारियों व खिलौनों के साथ मस्ती करते हैं।
इस लोकपर्व की एक खास परंपरा यह भी है कि युवक-युवतियां आपसी सहमति से जीवनसाथी चुनते हैं। यही कारण है कि भगोरिया फेस्टिवल को प्रेम और स्वतंत्रता का पर्व भी कहा जाता है। जनजातीय समाज में इसका विशेष सामाजिक महत्व है। होली से पहले मनाया जाने वाला यह उत्सव रंगों और उमंग का संदेश देता है। गांवों में कई दिन पहले से घरों की सफाई, नए कपड़ों की खरीद और मेले की तैयारी शुरू हो जाती है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम, 200 से ज्यादा जवान तैनात
इतने बड़े आयोजन को देखते हुए प्रशासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं। जिले के विभिन्न मेलों में दो सौ से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। पुलिस अधीक्षक डॉ. शिवदयाल सिंह ने नागरिकों से अपील की है कि वे भगोरिया फेस्टिवल को शांति और भाईचारे के साथ मनाएं।
संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल लगाया गया है। सीसीटीवी निगरानी और गश्त बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था को तुरंत रोका जा सके। प्रशासन ने साफ कहा है कि माहौल खराब करने की कोशिश करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
परंपरा, अर्थव्यवस्था और पर्यटन को बढ़ावा
भगोरिया फेस्टिवल का असर सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। इन सात दिनों में स्थानीय व्यापारियों की अच्छी कमाई होती है। खिलौनों, कपड़ों, आभूषणों और खाने-पीने की दुकानों पर भीड़ उमड़ती है।
स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्त्रों की बिक्री बढ़ जाती है। कई छोटे व्यापारी सालभर इस मेले का इंतजार करते हैं। इस तरह यह उत्सव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है।
इसके अलावा, भगोरिया फेस्टिवल झाबुआ को पर्यटन के नक्शे पर भी खास पहचान दिलाता है। आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से लोग इस अनोखे जनजातीय उत्सव को देखने पहुंचते हैं। इससे जिले की सांस्कृतिक छवि मजबूत होती है।
जनजातीय पहचान का प्रतीक है भगोरिया फेस्टिवल
भगोरिया फेस्टिवल सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की अस्मिता का प्रतीक है। यह पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाता है।
लोककथाओं के अनुसार, यह पर्व पुराने समय में हाट-बाजार के रूप में शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे सांस्कृतिक उत्सव में बदल गया। आज यह झाबुआ की पहचान बन चुका है।
दूर शहरों में काम करने वाले लोग भी इस दौरान छुट्टी लेकर अपने गांव लौट आते हैं। परिवारों का मिलन, दोस्तों की मुलाकात और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन इस उत्सव को खास बनाता है।
क्या कहते हैं स्थानीय लोग?
स्थानीय युवाओं का कहना है कि भगोरिया फेस्टिवल उनके लिए साल का सबसे बड़ा दिन होता है। वे महीनों पहले से तैयारी करते हैं। महिलाएं पारंपरिक लुगड़ा और चांदी के गहनों से सजती हैं। पुरुष रंगीन पगड़ी पहनकर मेले में पहुंचते हैं। बुजुर्गों का मानना है कि यह उत्सव नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है। आधुनिकता के इस दौर में भी जनजातीय संस्कृति इतनी मजबूती से जीवित है, यह गर्व की बात है।
आगे के सात दिन रहेंगे खास
24 फरवरी से शुरू हुआ यह उत्सव 2 मार्च तक चलेगा। हर दिन अलग-अलग स्थानों पर मेले लगेंगे और हर दिन का उत्साह अलग होगा। प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे पर्व का आनंद लें, लेकिन नियमों का पालन जरूर करें। झाबुआ में भगोरिया फेस्टिवल की शुरुआत के साथ ही रंगों का माहौल बन गया है। ढोल की थाप, हंसी-खुशी और पारंपरिक गीतों से पूरा जनजातीय अंचल गूंज उठा है।






