झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और ‘दिशोम गुरु’ के नाम से मशहूर शिबू सोरेन को केंद्र सरकार ने मरणोपरांत ‘पद्म भूषण’ सम्मान से नवाजने का फैसला किया है। इस घोषणा के साथ ही राज्य के सियासी गलियारों में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस निर्णय को ऐतिहासिक बताया है, वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इसे नाकाफी करार दिया है।
JMM का कहना है कि शिबू सोरेन का कद और उनका संघर्ष इतना विशाल है कि उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए। दूसरी तरफ, BJP का मानना है कि यह सम्मान न केवल शिबू सोरेन के संघर्षों की स्वीकार्यता है, बल्कि यह पूरे आदिवासी समाज के लिए गर्व का क्षण है।
JMM ने जताई नाराजगी, की भारत रत्न की मांग
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने केंद्र सरकार के इस फैसले पर असंतोष जाहिर किया है। पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया कि शिबू सोरेन का योगदान पद्म भूषण तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि झारखंड के लोग लंबे समय से अपने नेता के लिए भारत रत्न की मांग कर रहे हैं।
“दिशोम गुरु के लिए केंद्र सरकार ने जिस सम्मान की घोषणा की है, वह उनके कद से कम है। एक बड़ी जनसंख्या के उत्थान में जो उन्होंने अपना बलिदान दिया और जो उनका संघर्ष रहा है, उसके अनुरूप उन्हें सम्मान नहीं मिला। हम मांग करते हैं कि ऐसे वीर पुरुष को ‘भारत रत्न’ से नवाजा जाए।” — मनोज पांडेय, केंद्रीय प्रवक्ता, JMM
BJP ने किया स्वागत: संघर्षों को मिली पहचान
विपक्षी दल की नाराजगी के उलट, BJP ने केंद्र सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है। झारखंड BJP के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने इसे ‘दिशोम गुरु’ के संघर्षों के लिए एक बड़ा संदेश बताया। उन्होंने याद दिलाया कि शिबू सोरेन ने विषम परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
“शिबू सोरेन ने अपने जीवन में शराब बंदी और महाजनी प्रथा के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। यह सम्मान न सिर्फ उनके लंबे राजनीतिक संघर्ष की स्वीकार्यता है, बल्कि आदिवासी समाज के आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करता है।” — प्रतुल शाहदेव, प्रदेश प्रवक्ता, BJP
जल, जंगल और जमीन के रक्षक
शिबू सोरेन को झारखंड में ‘दिशोम गुरु’ यानी देश का गुरु कहा जाता है। उनका राजनीतिक सफर केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने दशकों तक जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए जमीनी लड़ाई लड़ी। संथाल परगना से शुरू हुआ उनका यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे झारखंड में आदिवासी अधिकारों की बुलंद आवाज बन गया। अलग झारखंड राज्य के गठन में उनकी भूमिका को ऐतिहासिक माना जाता है। उनके इसी जुझारू व्यक्तित्व और त्याग के कारण उन्हें मरणोपरांत इस राष्ट्रीय सम्मान के लिए चुना गया है।





