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भक्ति में अहंकार क्यों बनता है समस्या और इससे कैसे बचें? प्रेमानंद महाराज की सीख

Written by:Bhawna Choubey
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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में प्रेमानंद महाराज ने भक्ति और अहंकार के फर्क को बेहद आसान शब्दों में समझाया है। उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति क्या होती है और अहंकार आने पर साधक को क्या करना चाहिए।
भक्ति में अहंकार क्यों बनता है समस्या और इससे कैसे बचें? प्रेमानंद महाराज की सीख

आज के समय में भक्ति केवल मंदिर, पूजा या जाप तक सीमित नहीं रह गई है। लोग सोशल मीडिया पर भी अपने भक्ति अनुभव साझा करते हैं। इसी बीच प्रेमानंद महाराज का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने भक्ति के एक बहुत ही गहरे और जरूरी विषय पर बात की है, जो है भक्ति में अहंकार।

हम देखते हैं कि कई बार इंसान भक्ति के रास्ते पर चलते-चलते खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। उसे लगता है कि वह ज्यादा पूजा करता है, ज्यादा जानता है या ज्यादा पवित्र है। प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि यही सोच धीरे-धीरे भक्ति को खत्म कर देती है। क्योंकि जहां अहंकार आ गया, वहां भक्ति टिक ही नहीं सकती।

अहंकार और भक्ति साथ नहीं चल सकते

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, भक्ति का अर्थ है झुकना, समर्पण करना और प्रेम से भगवान को याद करना। लेकिन जैसे ही मन में यह भाव आता है कि मैं बहुत बड़ा भक्त हूं, उसी क्षण भक्ति कमजोर होने लगती है। महाराज बताते हैं कि अहंकार कोई एकदम से नहीं आता। यह धीरे-धीरे बनता है। पहले इंसान भक्ति करता है, फिर उसे अपनी भक्ति पर गर्व होने लगता है और फिर वही गर्व अहंकार में बदल जाता है। यही अहंकार भक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन है।

भक्ति में अहंकार कैसे पैदा होता है?

प्रेमानंद महाराज ने बहुत सरल भाषा में समझाया कि भक्ति में अहंकार कैसे जन्म लेता है जब भक्त यह सोचने लगे कि मैं रोज पूजा करता हूं, बाकी लोग नहीं करते, जब मन में यह भाव आए कि मेरी भक्ति सबसे अच्छी है, जब दूसरों की भक्ति को छोटा समझा जाए, जब भगवान की जगह खुद को बड़ा मानने लगें। महाराज कहते हैं कि यह सब अहंकार के लक्षण हैं। भक्ति का असली मतलब यह नहीं कि हम खुद को बड़ा दिखाएं, बल्कि यह है कि हम भगवान के सामने खुद को छोटा समझें।

सच्ची भक्ति की पहचान क्या है?

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, सच्ची भक्ति बहुत शांत होती है। उसमें दिखावा नहीं होता, शोर नहीं होता और तुलना भी नहीं होती। सच्ची भक्ति की पहचान इस प्रकार है जैसे मन में विनम्रता होती है, दूसरों के प्रति सम्मान होता है, भगवान का नाम लेते समय मन शांत रहता है, खुद को नहीं, भगवान को बड़ा माना जाता है। महाराज कहते हैं कि जहां “मैं” खत्म हो जाता है, वहीं से सच्ची भक्ति शुरू होती है। अगर भक्ति के बाद भी मन अशांत है, गुस्सा है या घमंड है, तो समझ लेना चाहिए कि भक्ति सही दिशा में नहीं जा रही।

 

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Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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