भारत की नदियों में नर्मदा नदी का नाम अलग ही सम्मान के साथ लिया जाता है। लोग इसे सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि मां का रूप मानते हैं। जब कोई श्रद्धालु नर्मदा किनारे पहुंचता है, तो उसे वहां गोल, चिकने और सुंदर आकार वाले पत्थर दिखाई देते हैं, जिन्हें नर्मदेश्वर शिवलिंग कहा जाता है। यही पत्थर लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं।
कहा जाता है कि नर्मदा नदी से निकलने वाले शिवलिंग साधारण नहीं होते। ये प्राकृतिक रूप से बने होते हैं और इन्हें स्वयंभू शिवलिंग माना जाता है। सबसे खास बात यह है कि इन्हें बिना प्राण प्रतिष्ठा के भी पूजा जा सकता है। आखिर क्यों नर्मदा नदी से निकलने वाले नर्मदेश्वर शिवलिंग इतने विशेष माने जाते हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
नर्मदा नदी और नर्मदेश्वर शिवलिंग का धार्मिक महत्व
नर्मदा नदी मध्यप्रदेश के अमरकंटक से निकलकर लंबी यात्रा तय करती हुई गुजरात में अरब सागर तक पहुंचती है। यह नदी पहाड़ों, चट्टानों और घाटियों से होकर गुजरती है। इसी दौरान पानी के तेज बहाव से कई पत्थर गोल और शिवलिंग जैसे आकार में बदल जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, नर्मदा नदी से निकलने वाले शिवलिंग को नर्मदेश्वर शिवलिंग कहा जाता है। इन्हें भगवान शिव और मां नर्मदा की संयुक्त शक्ति का प्रतीक माना जाता है। नर्मदा पुराण में कथा मिलती है कि मां नर्मदा ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। प्रसन्न होकर शिवजी ने वरदान दिया कि नर्मदा से निकलने वाला हर पत्थर शिव का रूप माना जाएगा।
क्यों नहीं करनी पड़ती प्राण प्रतिष्ठा?
आमतौर पर किसी भी शिवलिंग या मूर्ति को मंदिर में स्थापित करने से पहले प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। यह एक धार्मिक प्रक्रिया है, जिसमें मूर्ति में दिव्यता का आह्वान किया जाता है।
लेकिन नर्मदा नदी से निकलने वाले नर्मदेश्वर शिवलिंग के मामले में ऐसा नहीं है। मान्यता है कि ये स्वयंभू हैं, यानी प्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुए और पहले से ही दिव्य शक्ति से युक्त हैं। इसलिए इन्हें बिना प्राण प्रतिष्ठा के भी पूजा जा सकता है। यही कारण है कि देश के कई मंदिरों में नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की जाती है। मध्यप्रदेश से लेकर उत्तर भारत और दक्षिण भारत तक इनकी मांग रहती है।
प्राकृतिक प्रक्रिया से बनते हैं नर्मदेश्वर शिवलिंग
नर्मदा नदी का रास्ता सीधा नहीं है। यह नदी कई मोड़ों और चट्टानों से टकराती हुई आगे बढ़ती है। जब पानी तेज गति से बहता है, तो पत्थरों को घिसता रहता है। वर्षों तक लगातार घिसने से पत्थर गोल और चिकने हो जाते हैं।
यही प्राकृतिक प्रक्रिया नर्मदेश्वर शिवलिंग का आकार देती है। कई शिवलिंग पर प्राकृतिक धारियां या चिह्न भी दिखाई देते हैं, जिन्हें लोग शिव का आशीर्वाद मानते हैं। वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो यह भूगर्भीय प्रक्रिया का परिणाम है। लेकिन आस्था की नजर से देखें तो यह भगवान शिव की कृपा मानी जाती है।
किन स्थानों पर मिलते हैं नर्मदा नदी के शिवलिंग?
नर्मदा नदी अमरकंटक से शुरू होकर भेड़ाघाट, बरमान, नर्मदापुरम, ओंकारेश्वर और महेश्वर जैसे स्थानों से गुजरती है। इन क्षेत्रों में नर्मदेश्वर शिवलिंग विशेष रूप से मिलते हैं। ओंकारेश्वर तो स्वयं भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थल है। यहां नर्मदा नदी से निकले शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व है। कई श्रद्धालु नर्मदा परिक्रमा के दौरान इन शिवलिंगों को एकत्र करते हैं और घर ले जाकर पूजा करते हैं।






