
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार को नागपुर स्थित केंद्रीय संग्रहालय की प्रदर्शनी में रखे छत्रपति शिवाजी महाराज के ‘बाघ नख’ का अवलोकन किया। इस अवसर पर पारंपरिक युद्धकला का प्रदर्शन भी किया गया, जिसमें अखाड़ों के कलाकारों ने दानपट्टा, दंड युद्ध और तलवारबाजी जैसी पुरानी शास्त्रीय कलाओं का प्रदर्शन किया। बाघ नख देखते हुए भागवत ने कहा कि यह हमें अपने पराक्रम भरे इतिहास की याद दिलाता है और सभी लोगों को इसे देखना चाहिए। उन्होंने युवाओं को व्यायाम और पारंपरिक युद्धकला की आदत डालने की सलाह भी दी।
मोहन भागवत ने देखा छत्रपति शिवाजी का ‘बाघ नख’
इससे पहले, नागपुर में एक अन्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने संस्कृत भाषा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत देश की सभी भाषाओं की जननी है और इसका विकास भी राजकीय संरक्षण के तहत होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि संस्कृत को संचार का माध्यम बनाना चाहिए ताकि यह घर-घर तक पहुंचे। भागवत के अनुसार, संस्कृत न केवल एक भाषा है बल्कि हमारे भावों को विकसित करने का साधन भी है, इसलिए यह सभी को आनी चाहिए।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि देश की परिस्थिति के अनुसार भाषा का भी विकास होता है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने खुद संस्कृत सीखी है, हालांकि वह इसे धाराप्रवाह नहीं बोल पाते। उनका मानना है कि संस्कृत विश्वविद्यालयों को सरकारी संरक्षण के साथ-साथ जनता का भी सहयोग मिलना चाहिए, तभी भाषा का सही विकास संभव होगा।
मोहन भागवत ने आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में कहा कि आत्मनिर्भर बनने के लिए केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि बुद्धि और ज्ञान के विकास की भी आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी परंपरा, भाषा और संस्कृति से जुड़े रहें और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लें।
