ब्रिटेन से वापस आएगी 500 साल पुरानी थिरुमंगई आलवार की मूर्ति, तमिलनाडु के श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर में होगी स्थापित

ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एशमोलियन म्यूजियम ने तमिलनाडु के थाडिकोम्बु स्थित श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर से चोरी हुई थिरुमंगई आलवार की कांस्य मूर्ति भारत को सौंप दी है। यह औपचारिक हस्तांतरण 4 मार्च को लंदन के इंडिया हाउस में हुआ। जांच में मूर्ति की भारतीय उत्पत्ति की पुष्टि के बाद इसे वापस करने का निर्णय लिया गया।
Thirumangai Alvar

करीब पांच शताब्दियों पुरानी एक पवित्र कांस्य प्रतिमा अब अपने मूल धार्मिक संदर्भ की ओर लौट रही है। ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एशमोलियन म्यूजियम ने थिरुमंगई आलवार की मूर्ति भारत को आधिकारिक रूप से सौंप दी, और आगे इसे तमिलनाडु के थाडिकोम्बु स्थित श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर में पुनर्स्थापित किया जाएगा।

लंदन के इंडिया हाउस में मंगलवार, 4 मार्च को हुए समारोह में यह हस्तांतरण किया गया। भारतीय पक्ष के अनुसार, मूर्ति भारत पहुंचने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) निर्धारित प्रक्रिया के तहत तकनीकी और अभिलेखी सत्यापन करेगा, उसके बाद मंदिर में स्थापना की कार्रवाई आगे बढ़ेगी।

पहचान कैसे हुई और वापसी तक मामला कैसे पहुंचा

म्यूजियम के रिकॉर्ड के मुताबिक यह प्रतिमा 1967 में Sotheby’s के जरिए खरीदी गई थी। उस समय इसे वैध संग्रहण का हिस्सा माना गया। लेकिन 2019 में एक शोधकर्ता ने संकेत दिया कि यह मूर्ति तमिलनाडु के मंदिर की है और पुरानी तस्वीरों से इसका मिलान होता है।

यहीं से मामला निर्णायक मोड़ पर आया। पहचान सामने आने के बाद एशमोलियन म्यूजियम ने भारतीय उच्चायोग से संपर्क किया और भारत सरकार से मूर्ति तथा मूल मंदिर से संबंधित दस्तावेजी जानकारी मांगी। बाद की जांच में ASI, तमिलनाडु सरकार और मंदिर प्रशासन की भागीदारी रही, और निष्कर्ष यही रहा कि प्रतिमा भारत की ही है।

“हमें करीब पांच साल पहले इस मूर्ति की पृष्ठभूमि का पता चला। यह मंदिर से चोरी की गई प्रतिमा की पुरानी तस्वीरों से मेल खाती थी, और स्पष्ट था कि इसे वैध तरीके से भारत से नहीं लाया गया था।”- डॉ. ज़ा स्टर्गिस, निदेशक, एशमोलियन म्यूजियम

डॉ. स्टर्गिस ने यह भी कहा कि संग्रहालय ने 1967 में इसे अच्छी नीयत से खरीदा था और अब उसी साफ नीयत के साथ इसे भारत लौटाया जा रहा है।

यह मामला केवल कला-वस्तु का नहीं, जीवित परंपरा का भी

ब्रिटेन के सार्वजनिक विमर्श में इस हस्तांतरण को सांस्कृतिक संपत्ति की वापसी से आगे, आस्था और जीवित विरासत के संदर्भ में भी देखा गया। हाउस ऑफ लॉर्ड्स की सदस्य बैरोनेस थंगम डेबोननेयर ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि यह सिर्फ कला का नमूना नहीं, बल्कि एक जीवित मंदिर की पवित्र मूर्ति है।

समारोह में चार अन्य भारतीय प्राचीन वस्तुएं भी भारत को सौंपी गईं। इससे यह संकेत भी मिला कि स्रोत-देश से जुड़े दावों की जांच और वैधानिक निष्कर्ष के बाद संस्थागत स्तर पर वापसी की प्रक्रिया अब अधिक स्पष्ट ढांचे में आगे बढ़ सकती है।

एशमोलियन के लिए क्यों अहम है यह फैसला

एशमोलियन म्यूजियम के संग्रह पर पहले भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से दावे उठते रहे हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक किसी दावे के बाद किसी वस्तु की वापसी का यह पहला मामला है। इस कारण यह निर्णय संग्रहालय के इतिहास में एक मिसाल माना जा रहा है।

भारत के लिए इसका महत्व दोहरा है: पहला, मंदिर से बाहर गई धार्मिक प्रतिमा की वापसी; दूसरा, कई एजेंसियों के समन्वय से प्रमाण-आधारित पुनर्प्राप्ति का उदाहरण। अब अगला चरण भारत में वैधानिक परीक्षण और पुनर्स्थापन का है, जिसके बाद यह मूर्ति अपने मूल मंदिर परिसर में फिर स्थापित की जाएगी।

Gaurav Sharma
लेखक के बारे में
Gaurav Sharma

निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
Follow Us :GoogleNews