
आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन से औपचारिक रूप से अलग होने का ऐलान कर दिया है जो आगामी मॉनसून सत्र से पहले विपक्षी राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत देता है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में हालिया हार के बाद आप ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए यह कदम उठाया है। दिल्ली में 2015 और 2020 में 90 प्रतिशत से अधिक सीटें जीतने वाली आप इस बार केवल 22 सीटों पर सिमट गई और अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया जैसे प्रमुख नेता अपनी सीटें हार गए। अब पार्टी ‘एकल चलो रे’ की रणनीति अपनाकर अपनी मूल पहचान और जनता का भरोसा फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है।
पंजाब में आप सत्ता में है। अब पार्टी का यह एकमात्र गढ़ है। 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव आप के लिए निर्णायक होंगे। मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में आप को सत्ता विरोधी लहर से निपटना होगा जबकि कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में आक्रामक रुख अपना रही है। इंडिया गठबंधन से अलग होने का फैसला आप को कांग्रेस से स्वतंत्र अपनी पहचान बनाए रखने में मदद करेगा जो पंजाब में उसकी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए जरूरी है। पंजाब में हार आप की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए बड़ा झटका हो सकता है।
उपचुनावों में आप की जीत
हाल ही में पंजाब और गुजरात में हुए उपचुनावों में आप की जीत ने इस नई रणनीति को बल दिया है। पंजाब के लुधियाना पश्चिम में कांग्रेस को और गुजरात के विसावदर में बीजेपी को हराकर आप ने अपनी ताकत दिखाई। ये जीतें आप की स्वतंत्र चुनाव लड़ने की रणनीति को दर्शाती हैं जिससे पार्टी को दोनों राज्यों में कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने का मौका मिला है। 2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों में आप ने पांच सीटें जीतकर कांग्रेस को कमजोर किया था और अब वह इस सफलता को और बढ़ाने की योजना बना रही है।
मुद्दों पर केंद्रित गठबंधन बनाने की सोच
इंडिया गठबंधन से अलग होकर आप अब क्षेत्रीय राजनीतिक हकीकतों के आधार पर मुद्दों पर केंद्रित गठबंधन बनाने की दिशा में बढ़ रही है। हालांकि, इस कदम से विपक्ष की सामूहिक ताकत कमजोर हो सकती है जिससे बीजेपी को राज्यों और केंद्र में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल सकता है। आप की यह रणनीति न केवल उसकी स्वतंत्र पहचान को फिर से स्थापित करने की कोशिश है बल्कि 2027 के पंजाब और गुजरात चुनावों में अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने का भी प्रयास है।
