
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से अपने भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रशंसा की, जिसके बाद विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। मोदी ने आरएसएस की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर इसे विश्व का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन बताते हुए इसकी सेवा और समर्पण की सराहना की। उन्होंने कहा कि आरएसएस ने व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण के लिए पिछले 100 वर्षों से कार्य किया है। इस बयान पर विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मोदी ने स्वतंत्रता संग्राम का अपमान किया और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन किया।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आरएसएस की प्रशंसा को स्वतंत्रता संग्राम का अपमान करार दिया। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस और इसके सहयोगियों ने ब्रिटिश शासन की सेवा की और गांधी से अधिक नफरत की, जितना उन्होंने ब्रिटिशों का विरोध किया।” ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सवाल उठाया कि मोदी ने एक स्वयंसेवक के रूप में नागपुर में जाकर आरएसएस की प्रशंसा क्यों नहीं की, बल्कि प्रधानमंत्री के रूप में लाल किले से ऐसा क्यों किया।
‘धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की भावना का उल्लंघन’
कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने भी मोदी के बयान की कड़ी आलोचना की। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की भावना का उल्लंघन बताया और कहा कि यह मोदी का अपनी 75वीं जन्मदिन से पहले आरएसएस को खुश करने का प्रयास है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने आरोप लगाया कि आरएसएस का इतिहास औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई का नहीं, बल्कि भारतीयों के बीच नफरत और विभाजन फैलाने का है।
‘RSS का ऐतिहासिक रिकॉर्ड संदिग्ध‘
सीपीआई(एम) के महासचिव एमए बेबी ने कहा कि आरएसएस का ऐतिहासिक रिकॉर्ड संदिग्ध है और उसने स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं निभाई। उन्होंने मोदी के भाषण को शहीदों की स्मृति और स्वतंत्रता आंदोलन की भावना का अपमान बताया। विपक्ष का कहना है कि पीएम मोदी का यह बयान राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाला है और स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय मंच का राजनीतिक लाभ के लिए दुरुपयोग किया गया।
