सुप्रीम कोर्ट उच्च न्यायालयों से श्रेष्ठ नहीं, दोनों समान; चीफ जस्टिस बीआर गवई ने ऐसा क्यों कहा

चीफ जस्टिस ने ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे सुधारकों को भी याद किया, जिन्होंने 19वीं सदी में हाशिए पर पड़े समुदायों की लड़कियों की शिक्षा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
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भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट उच्च न्यायालय से श्रेष्ठ नहीं है, बल्कि दोनों संवैधानिक योजना के तहत समान संवैधानिक न्यायालय हैं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली में उच्च न्यायालय का पहला निर्णय महत्त्वपूर्ण होता है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम केवल नामों की सिफारिश करता है और उच्च न्यायालय कॉलेजियम से विचार करने का अनुरोध करता है।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने स्वतंत्रता दिवस को उत्सव और स्मरण दोनों बताया, जिसमें उन्होंने 1855 के संथाल हुल विद्रोह, 1857 की क्रांति, रानी लक्ष्मीबाई, बिरसा मुंडा, जलियांवाला बाग नरसंहार और चंपारण सत्याग्रह जैसे ऐतिहासिक संघर्षों का उल्लेख किया। उन्होंने उन हजारों लोगों को श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने विदेशी शासन और शोषण के खिलाफ एकजुट होकर बलिदान दिया।

सुधारकों को किया याद

चीफ जस्टिस ने ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे सुधारकों को भी याद किया, जिन्होंने 19वीं सदी में हाशिए पर पड़े समुदायों की लड़कियों की शिक्षा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मुख्य न्यायाधीश ने महात्मा गांधी के कथन ‘खुद को खोजने का सबसे अच्छा तरीका दूसरों की सेवा में खो जाना है‘ को उद्धृत करते हुए इसे आज भी शासन और जीवन के लिए नैतिक दिशासूत्र बताया।

ऐतिहासिक यात्रा का जिक्र

अंत में उन्होंने संथाल समुदाय की ऐतिहासिक यात्रा का जिक्र किया, जो 1855 के विद्रोह से लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के रूप में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंची। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायाधीशों और वकीलों का कर्तव्य केवल कानून की व्याख्या करना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूलभूत मूल्यों को सक्रिय रूप से बनाए रखना और बचाव करना है जो भारत के लोकतंत्र की नींव हैं।

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