मंगलवार को कोलकाता के मेट्रो चैनल पर चल रहे धरने में एक अलग ही दृश्य दिखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाषण नहीं, बल्कि ड्राइंग के जरिए चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए और वोटर लिस्ट से नाम हटाने के आरोप को सांकेतिक तरीके से सामने रखा।
धरने के स्टेज पर रखे हरे बोर्ड पर उन्होंने ऊपर ‘SIR’ लिखा और बीच में सफेद रंग से ‘गायब’ उकेरा। इसके बाद छोटे-छोटे टेढ़े-मेढ़े गोले और नक्शे जैसी एक बड़ी आउटलाइन बनाते हुए उन्होंने बोर्ड के कुछ हिस्सों को सफेद रंग से ढंकना शुरू किया। इस पूरी कार्रवाई को TMC नेताओं ने वोटर सूची से नाम ‘मिटाए जाने’ का प्रतीक बताया।
दिलचस्प यह रहा कि जिस समय ममता बनर्जी यह सांकेतिक प्रस्तुति दे रही थीं, उसी समय मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस भी चल रही थी।
धरना पांचवें दिन पहुंचा तो विरोध का तरीका क्यों बदल गया?
ममता बनर्जी 6 मार्च से SIR के खिलाफ धरने पर हैं। शुरुआती दिनों में उनका फोकस राजनीतिक और संवैधानिक आरोपों पर था, लेकिन मंगलवार को विरोध का स्वरूप विजुअल और प्रतीकात्मक दिखा। राजनीतिक संदेश साफ था कि मुद्दा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मताधिकार के दायरे तक पहुंच गया है।
TMC लगातार कह रही है कि SIR के नाम पर असली मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा रहा है। पार्टी का आरोप यह भी है कि यह प्रक्रिया 2026 विधानसभा चुनाव से पहले चुनावी संतुलन को प्रभावित कर सकती है। ममता बनर्जी ने पिछले दिनों चुनाव आयोग पर BJP के इशारों पर काम करने का आरोप दोहराया है, हालांकि चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर अपने स्तर से प्रक्रिया-आधारित रुख ही सामने आता रहा है।
यही वजह है कि यह विवाद सिर्फ राज्य की सियासत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी मोर्चे पर भी तेजी से बढ़ा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ, और इसका सीधा असर किस पर पड़ेगा?
पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के खिलाफ ममता बनर्जी और अन्य TMC सांसदों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेकर नोटिफिकेशन जारी किया जाए और एक अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाया जाए, जिसमें एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश और अन्य जज शामिल हों।
इस ट्रिब्यूनल का काम उन अपीलों को सुनना होगा जिन्हें ज्यूडिशियल ऑफिसर खारिज कर रहे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी अर्जी को ज्यूडिशियल ऑफिसर रिजेक्ट करते हैं तो उसका कारण दर्ज करना होगा। ट्रिब्यूनल का खर्च चुनाव आयोग उठाएगा।
चुनाव आयोग HC के CJ से सलाह कर नोटिफिकेशन जारी करे और अपीलेट ट्रिब्यूनल गठित करे।- सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि ज्यूडिशियल ऑफिसर्स करीब 7 लाख मामलों को प्रोसेस कर चुके हैं। कुल मामलों की संख्या 63 लाख बताई गई, यानी अभी लगभग 57 लाख मामले बाकी हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि विवाद का पैमाना बहुत बड़ा है और प्रशासनिक तंत्र पर दबाव भी असाधारण है।
अब असली लड़ाई कहां है: सड़क पर, कोर्ट में या बूथ स्तर पर?
फिलहाल तीन समानांतर मोर्चे साफ दिखाई दे रहे हैं। पहला, कोलकाता के मेट्रो चैनल पर जारी राजनीतिक विरोध, जहां ममता बनर्जी इसे लोकतांत्रिक अधिकार का मुद्दा बनाकर जनता से सीधा संवाद कर रही हैं। दूसरा, कानूनी प्रक्रिया, जहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अपील निपटाने का नया ढांचा बनना है। तीसरा, जमीनी स्तर की प्रशासनिक प्रक्रिया, जहां लाखों लंबित आवेदनों का निपटारा होना बाकी है।
यह पूरा विवाद इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि वोटर लिस्ट का प्रश्न सीधे चुनावी वैधता, प्रतिनिधित्व और मताधिकार से जुड़ता है। अगर बड़ी संख्या में दावे-आपत्तियां लंबित रहती हैं, तो राजनीतिक बयानबाजी और कानूनी दखल दोनों तेज हो सकते हैं। वहीं अगर ट्रिब्यूनल बनकर काम शुरू करता है, तो असली परीक्षा समय-सीमा और पारदर्शिता की होगी।
ममता बनर्जी का मंगलवार वाला सांकेतिक प्रदर्शन राजनीतिक तौर पर असरदार दृश्य जरूर बना, लेकिन अगले चरण में बहस आंकड़ों, आदेशों और अपीलों की रफ्तार पर टिकेगी। आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या लंबित 57 लाख मामलों का निपटारा समय पर और निष्पक्ष तरीके से हो पाता है।






