बिहार में मतदाता सूची के सुधार (SIR: Special Intensive Revision) को लेकर चल रहे विवाद ने रविवार को नया मोड़ ले लिया। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मतदाता सूची में हेराफेरी हो रही है और सत्ता पक्ष के दबाव में काम किया जा रहा है। विपक्ष ने इसे “वोट चोरी” करार देते हुए बिहार की राजनीति में बड़ा मुद्दा बना दिया। इन आरोपों पर चुनाव आयोग ने पहली बार खुलकर जवाब दिया और साफ किया कि संस्था पूरी तरह निष्पक्ष और संवैधानिक दायरे में काम कर रही है।
हमारे लिए सब समकक्ष
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस वार्ता में विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि- “भारत के संविधान के अनुसार हर नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, उसे मतदान का अधिकार है। चुनाव आयोग का कार्य इस अधिकार को सुनिश्चित करना है। हमारे लिए न कोई पक्ष है, न विपक्ष… सब समकक्ष हैं।” सीईसी ने यह भी दोहराया कि कानून के अनुसार हर राजनीतिक दल का पंजीकरण चुनाव आयोग के साथ होता है। ऐसे में आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाना न केवल गलत है बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को ठेस पहुँचाने वाला है।
वोट चोरी कहना संविधान का अपमान
ज्ञानेश कुमार ने विपक्षी दलों के “वोट चोरी” वाले आरोपों को सख्त लहजे में खारिज किया। उन्होंने कहा कि अगर किसी मतदाता सूची में त्रुटि है, तो उसे समय रहते साझा करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि- “कानून के मुताबिक अगर किसी उम्मीदवार या मतदाता को आपत्ति है, तो 45 दिनों के भीतर कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की जा सकती है। लेकिन सुधार की पूरी प्रक्रिया से हटकर सीधे ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना जनता को गुमराह करने की असफल कोशिश है। यह भारत के संविधान का अपमान है।”
गलत सूचना फैलाने का आरोप
चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों पर “गलत सूचना फैलाने” का आरोप लगाया। मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि बिहार में विशेष पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के लिए अभी भी 15 दिन शेष हैं और इस दौरान कोई भी मतदाता अपनी आपत्ति या सुधार का दावा पेश कर सकता है। उन्होंने कहा कि- “यह चिंता का विषय है कि कुछ दल जमीनी हकीकत को नज़रअंदाज कर रहे हैं और जनता में भ्रम फैला रहे हैं। आयोग के दरवाजे सभी दलों और नागरिकों के लिए समान रूप से खुले हुए हैं। बूथ स्तर पर अधिकारी और एजेंट पारदर्शी तरीके से कार्य कर रहे हैं।” आयोग का मानना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की यह पहल पारदर्शिता और लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ाने का प्रयास है, न कि किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुँचाने का साधन।
वोटरों से सीधी अपील
इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने मतदाताओं से सीधे अपील भी की। आयोग ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए हर नागरिक को जागरूक होकर मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाना चाहिए और समय रहते किसी भी गड़बड़ी की सूचना देनी चाहिए।
ज्ञानेश कुमार ने कहा कि- “हमारा संदेश साफ है – 18 वर्ष से ऊपर का हर नागरिक मतदाता बने और मतदान करे। यही लोकतंत्र की ताकत है और यही संविधान की सच्ची रक्षा है।”
राजनीतिक संदर्भ और भविष्य की चुनौती
बिहार SIR को लेकर उठे विवाद ने साफ कर दिया है कि आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक गर्मी और बढ़ने वाली है। विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता पर जोर दे रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल युग में मतदाता सूचियों का दुरुस्त और पारदर्शी होना बेहद आवश्यक है। इस प्रक्रिया में किसी भी तरह का संदेह चुनाव आयोग की साख और लोकतंत्र की मजबूती दोनों को प्रभावित कर सकता है।
बिहार में वोटर लिस्ट सुधार पर मचे घमासान के बीच चुनाव आयोग की यह सफाई महत्वपूर्ण है। आयोग ने न केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया बल्कि मतदाताओं को भी जिम्मेदारी निभाने की अपील की। साफ है कि चुनाव आयोग आने वाले समय में पारदर्शिता और सहभागिता को ही अपनी प्राथमिकता मानकर आगे बढ़ रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष आयोग की इस दलील से संतुष्ट होता है या यह विवाद आने वाले चुनावी माहौल को और गर्माता है।
